कलिकथा वाया बाईपास: एक विस्तृत फलक

अलका सरावगी का पहला उपन्यास ‘कलिकथा: वाया बाईपास’ पाँच पी-िसजय़यों
पहले मारवाड़ (राजस्थान) से कलकत्ता आकर बसे मारवाड़ियों और
कलकत्ता के सा-हजये इतिहास की कहानी को सजोएं हुए है। बंगाली रईसों
और ज़मीदारों से होकर मारवाड़ियों के वंशजों की कहानी-ंउचय
जिनके हाथ में आज कलकत्ता शहर का आर्थिक साम्राज्य है। ईस्ट
इंडिया कंपनी, लार्ड क्लाइव, मीर जाफर, सेठ अमीरचंद और जगत सेठ जैसे
ऐतिहासिक पात्र भी इस उपन्यास में आते हंै। आज़ादी से पहले
मारवाड़ियों का एकमात्र लक्ष्य पैसा कमाना था, वहीं आज स्थिति बदल गयी
है।
विस्तृत फलक वाले इस उपन्यास में एक साथ कई समाजों की कथा
मौजूद है। मारवाडी समाज, बंगाली समाज, कलकत्ते में बसा मारवाडी
समाज, स्वाधीनता आंदोलन के दौरान कलकत्ता तथा आज के कलकत्ता
शहर की भी ठोस उपस्थिति है। इस तरह यह वर्तमान भारतीय समाज की
विसंगतियों और भविष्य के संकट की ओर संकेत करता है। 18वीं
शताब्दी की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ, 20वीं शताब्दी का अत्यधिक
परिवर्तनशील घटनाक्रम और 21वीं सदी के भविष्यव्यापी सांकेतिक परिवर्तन
को अपने में समेटे है। मारवाडी समाज के प्रति लेखिका को गहरा लगाव
है। फिर भी यह उपन्यास आज़ादी पूर्व से इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर
दस्तक देता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष 1947 के बाद स्वार्थी
तत्वों द्वारा सत्ता में बंदरबाट, उपभोक्तावाद, पश्चिमी जीवनशैली के
प्रति आकर्षण, मोहभंग, राजनीतिक उथल.पुथल, सांप्रदायिक दंगें,
विदेशी कंपनियों का ब-सजय़ता वर्चस्व जैसे तमाम मुद्दे उपन्यास की
कथा को उजागर करते हैं।
उपन्यास में किशोर बाबू के परिवार की छः पीड़ियों की कथा
में आज़ादी पूर्व से आज़ादी के पचास वर्ष बाद तक के कालखण्ड को
उकेरा गया है। जिसमें मारवाडी परिवार के दुख.सुख, अंग्रेजों से
दोस्ती और बिखरते मूल्यों की विस्तृत कथा है। घमंडीलाल से लेकर
किशार बाबू के पुत्र तक की यात्रा तय की गई है। इस उपन्यास की कथावस्तु
राजस्थान की मरुभूमि से कलकत्ता जा बसे मारवाड़ियों की सामाजिक,
सांस्कृतिक और धार्मिक स्थिति से अवगत कराती है। कलकत्ता में बसे
मारवाड़ियों का अपना इतिहास है। विचार और जीवन शैली है।

व्यापारकुशल मारवाडी वणिए हंै। उन्हें दिसावरी का दुख है। अतीत
के परिप्रेक्ष्य में ही मारवाडी समाज के वर्तमान का उदघाटन होता है।
उनकी संस्कारगत मानसिकता, वर्तमान भारतीय समाज की विसंगतियों और
भविष्य की विपत्तियों को चिन्हित करती है। कलकत्ता में बसा मारवाडी
और बंगाली समाज उनकी मानसिकता, स्वाधीनता आंदोलन के समय
कलकत्ता और आज कलकत्ता शहर की ठोस उपस्थिति को उजागर करती है।
किशोर बाबू अपने दादा.पड़दादा की कहानी के माध्यम से
मारवाड़ियों की पैसा कमाने की प्रवृति का पर्दाफाश करते हैं कि
मारवाडी कितने स्वार्थी हैं। इसी स्वार्थसिद्धि के लिए किशोर के
पड़दादा ने अंग्रेजों की मदद करके देशभक्ति से अधिक महत्त्व
राजभक्ति को दिया।

उपन्यास के कथानायक किशोर बाबू एक पढ़े लिखे मारवाड़ी
व्यापारी हैं। जिनके पूर्वज कई पी-िसजय़यों पहले कलकत्ता आकर बस गए और
साथ में लाए अपने मारवाड़ी सामंती संस्कार। इतने वर्षों तक कलकत्ता
में रहकर भी मारवाड़ी के मारवाड़ी ही रहे-ंउचय व्यापार से, विचारों से
और संस्कारों से। न कोई परिवर्तन, न कोई चाह। किसी ने आवाज़ न
उठायी और जिसने उठायी उसे मरा मान लिया गया। जैसे बनवारी-ंउचय किशोर
का चचेरा भाई। जिसे बंगाली लड़की से विवाह करने के कारण पिता द्वारा
मरा मान लिया गया। ‘‘चाचा ने गाली गलौच से बनवारी का स्वागत किया
और उसे मछली खाने वाली कुलनाशिनी औरत के साथ घर की देहरी से
उलटे पांव यह कहते हुए लौटा दिया था कि आज से तुम हमारे लिए मर
गये।’’
अमोलक, शांतनु और किशोर बाबू के द्वारा तीन भिन्न.भिन्न
पात्रों को ग-सजय़ा गया है। अमोलक उम्मीदों के विपरीत निकलता है,
दूसरा शांतनु जो दिखता था वो नहीं बनता। बल्कि सुभाषचंद्र बोस
के लिए मरने वाला शांतनु सुभाषचंद्र बोस का ही मज़ाक उड़ाने
लगता है। तीसरा किशोर बाबू एक पंडुलम की भांति है जो अपने
मारवाड़ी समाज की परिधि में ही घूमता रहता है। एक छोर से दूसरे
छोर तक। कुछ अलग कर गुजरने की हिम्मत जुटाने में असमर्थ।
बाईपास सर्जरी के बाद किशोर बाबू में परिवर्तन होने लगा। अब
उन्हें अपनी पत्नी की बेखौफ धारणा का प्रकटीकरण लोकतंत्र
लगता है। हमारे महापुरुषों की लगी मूर्तियों पर ंचिड़िया.कबूतरांे
द्वारा बीट करने को वे महापुरूषों का सार्वजनिक अपमान मानते हैं और

इन मूर्तियों पर छतरी लगवाने के लिए मुख्यमंत्री ज्योतिबसु को पत्र लिखते
हैं। किशोर आज अपने ही परिवार के सदस्यों के लिए बीमार, पागल, सनकी
और -हजयक्की हो गए हैं क्योंकि अब किशोर अपनी अलग ही दुनिया में
है उनकी बौद्धिक प्रखरता और संवेदनशीलता ने उन्हें नया आयाम दे
दिया है। किशोर बाबू के परिवार में सब बीमार हैं। उससे किशोर बाबू
और उनकी पत्नी तथा किशोर बाबू और उनके बेटे के बीच चेतना
का अंतराल। पत्नी और बेटे के लिए किशोर बाबू बीमार है। लेकिन
किशोर को अपनी पत्नी और बेटे की दुनिया रोमांचहीन और कट एंड
डायड लगती है। वे अपने परिवार को अपने अंतर्मन की दुनिया के हिस्सेदार
बनाना नहीं चाहते। क्योंकि यह उन लोगों के चालू मापदंडों से
भिन्न हैं।
पलायन और आत्मबचाव किशोर की चारित्रिक विशेषताएँ हैं। जिस
कारण वह अमोलक और शांतनु के साथ आज़ादी की लड़ाई में
भागीदारी नहीं लेता। कुछ दिन पहले पड़े डंड़े के दर्द से किशोर
के डरपोक होने का पता चलता है। परिवार की जिम्मेदारियों और
विपत्तियों ने चारित्रिक विशेषताओं को उभरने का मौका नहीं
दिया। मामा की दुकान पर बैठने से मिलने वाले पैसे से घर चलाना। घर
में दो विधवाओं-ंउचय माँ और भाभी (शांता) का बो-हजय सब
किशोर के कंधो पर है।
मारवाड़ी समाज में औरतों की स्थिति टस से मस होने का नाम
नहीं लेती। अलका ने शांतनु के माध्यम से बंगाली और मारवाड़ी
समाज मेें औरतों को लेकर किये जाने वाले दृष्टिभेद पर दृष्टिपात किया
है कि कैसे बंगाली समाज में औरतें कितनी स्वतंत्र है और मारवाड़ी
समाज अपने रीति.रिवाजों में जकड़ा हुआ है। ये औरतें केवल उनके
मान . मर्यादा, प्रतिष्ठा, इज्जत जैसे शब्दों की बलि च-सजय़ाई जाती है। जैसे वे इंसान नहीं कोई वस्तु हैं। किशोर बाबू के मन में
उधेड़बुन है कि एक तरफ शांता भाभी का पुनर्विवाह करवाना जिसके
लिए कोई तैयार नहीं होगा दूसरी ओर उसके सुंदर मामा जो रोज़
वेश्या के पास जाते है। किसी मामा के बहू बाज़ार जाने से बदनामी नहीं
होती, पुनर्विवाह से बदनामी नहीं होती लेकिन एक निर्दोष औरत का
पुनर्विवाह करने से समाज में बदनामी हो जाएगी। यह कैसा समाज है?
मारवाड़ी समाज में औरतों को एक ब्रांड/स्टेटस सिंबल की तरह
इस्तेमाल किया जाता है। जब किशोर ने पहली बार अपने चचेरे भाई
बनवारी की पत्नी को देखा तो उसकी शक्ल और पहनावा उसे अच्छा

नहीं लगा। किशोर के लिए शारीरिक रूप.श्रंृगार मन लुभावना होना
चाहिए। बनवारी मारवाड़ी रीति.रिवाजों का विरोध करता है। भला वह
समाज उसका कैसे हो सकता है जिसने जरूरत के समय उसका हाथ नहीं थामा।
बड़े भाइयों और पिता द्वारा नज़रअंदाज़ किए जाने पर एक बंगाली
लड़की बनवारी का हाथ थामने कों तैयार हो जाती है वह भी
पूरे मारवाड़ी तौर.तरीकों के साथ। लेकिन ससुराल पक्ष द्वारा बंगाली
होने के कारण विवाह पश्चात् आरती की थाली से स्वागत करने की
अपेक्षा उस बंगाली लड़की को गालियाँ देकर घर से धक्के मारकर निकाल
दिया गया। क्या यहीं है एक बंगाली लड़की का हाथ थामने की सजा, जिस
कारण पूरा बंगाली समाज तक गालियाँ सुने।
प-सजये . लिखे होने पर भी औरतों के विषय में किशोर के विचार आम मारवाड़ियों जैसे हंै। कहीं कोई परिवर्तन नहीं और न
परिवर्तन की आस। उनकी लड़कियाँ भी उन्हंे हिटलर कहती हंै। एक
तानाशाह पिता मानती है। स्त्रियों की स्थिति सोचनीय है। पारिवारिक
प्रतिबंधता और संबंध, पर्दा प्रथा, धार्मिक रु-िसजय़याँ, अंधविश्वास आदि
सभी बिन्दु एक.एक कर खुलते हैं।
मर्यादा मनुष्य स्वयं बनाता है, समाज नहीं। मर्यादा मनुष्य से ऊपर
नहीं है। मनुष्य से मर्यादा है इसलिए मनुष्य जीवन की अपेक्षा मर्यादा को
महत्त्व देना भगवान द्वारा दिए गये इस जीवन का निरादर करना है। यही कुछ
किशोर की भाभी के साथ हो रहा है। उसके भाई की मृत्यु का
दुख तो सबको है लेकिन जीते जी शांता को तिल.तिलकर मारना कहाँ की
मर्यादा है। क्या सारी मर्यादाएं औरतों के लिए ही है। किशोर के
मामा के लिए कोई मर्यादा नहीं है जिनकी दूसरी पत्नी खुद उन्हें
जूते पहनाकर बहू बाज़ार भेजती है और जिस दिन मामा बहू बाज़ार नहीं
जाते उस दिन खुद अपने हाथों से उन्हें शराब डालकर पलाती है। एक
तरफ़ तो सिर से घंूघट सरकना भी गँवारा नहीं। दूसरी ओर, पति को
शराब पिलाना। यह कैसा दोगलापन है मारवाड़ी समाज का। ध्यान देने
वाली बात ये है कि यह दोगलापन मारवाड़ी ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय
समाज में व्याप्त है।
वहीं दूूसरी ओर एक ऐसे भविष्य की आशा है जहाँ स्वतंत्रता जन.
संकट को दूर करेगी और हमारी समस्याओं का संतोषजनक हल
निकालेगी। विदेशी ऋण हमारी अर्थ नीति में कहीं बाधक नहीं
बनेगा। धर्म, वर्ग, अर्थ और जातिगत वैष्मय की वो दीवार -सजयह जाएगी
जिनसे मनुष्य के बीच खाई पाट दी थी।

संप्रदायिक दंगों, स्वतंत्र भारत के अन्य राजनीतिक षड़यंत्रों
के साथ उपभोक्तावादी अपसंस्कृति, गहरी तकलीफ से उत्पन्न निस्संगता के
साथ यहाँ विश्लेषित हुई है। जो इस उपन्यास का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। यह
उपन्यास समकालीन जीवन के संक्रमणकालीन माहौल में उपनिवेशवाद के
उस दौर से शुरु होता है जब अठराहवीं शताब्दी में ब्रिटीश सरकार
भारत में अपनी जड़ें मजबूत करने लगी थी। इस प्रकार उपन्यास का
उद्देश्य न तो कहानी सुनाना है न चरित्र विशेष को नायकत्व की
मर्यादा में बांधता है और न इतिहास का पूरा पुर्नाख्यान करता है। यह
उपन्यास स्वाधीनता आंदोलन के उन प्रसंगों तक जाता है जहाँ सुभाष.
गांधी का द्वंद्व है, बंगाल का भीषण अकाल है ‘डायरेक्ट एक्शन डे’
का सांप्रदायिकता का तांडव है, कलकत्ता की राजनीतिक गतिविधियाँ हंै
और आज़ादी पश्चात् का गंभीर प्रश्न है। मोहभ्ंाग की स्थिति जिन
मूल्यों, आदर्शाें और स्वप्नों को लेकर आज़ादी की लड़ाई
लड़ी थी, वे कहाँ गये? उनका क्या हुआ? आज़ाद भारत की उत्तरकथा
कहने के लिए किशोर बाबू ही वो माध्यम है जिनके माध्यम से लेखिका ये
सवाल खड़े करती है। सांप्रदायिकता, गरीबी, भ्रष्टाचार, राजनीतिक
विसंगतियों आदि के गवाह रहे किशोर बाबू अंततः स्वीकरते है कि आज
भी कोई समस्या नहीं सुल-हजयी। लाखों लोगों का खून बहने से
मिला विभाजन क्या दे पाया? अपने जैसे भाषा बोलने वाले और अपने
जैसी ही जलेबी और कलाकंद खाने वाले लोगों के साथ युद्ध? उन्हें
शत्रु मानकर हथियार जमा करने और सेना को तैयार रखने के लिए अरबों
रुपये का खर्च, जबकि आज भी कलकत्ते की सड़कों पर को-सजय़ी,
भीखमंगे, औरतें, बच्चे उसी तरह भूखे.नंगे फिरते है।
अपने देश के स्रोतों को बाईपास कर विदेशी कर्जाें के बल पर
भला क्या किसी राष्ट्र का निर्माण हो सका है। यह तो स्वयं प्रयास करने से
होगा। जब भी समाज में परिवर्तन की लहर आयी साहित्य ने उसे बखूबी
अपने पन्नों में कैद किया है। समकालीन हिन्दी उपन्यास ने भी इस
कसौटी पर खरा उतरने का प्रयास किया है। बीसवीं शताब्दी के अंतिम
दशकों में देश की स्थितियों में तीव्रतर परिवर्तन हुए। उदारीकरण
और भूमंडलीकरण ने एक नयी क्रांति को जन्म दिया। एक ओर,
उत्तरआधुनिकता का दौर जिसने इतिहास का अंत कर दिया और ईश्वर को
मरा घोषित कर दिया। दूसरी ओर, आतंकवाद तथा सांप्रदायिकता जो रूकने
का नाम नहीं ले रही है। ऐसे समय में अपने देश और समाज की
गतिविधियों पर नज़र रखना और उन्हें साहित्य में दर्ज करने का काम तो
साहित्यकार ही कर सकता है। जिसके लिए उपन्यास से अच्छी विद्या कौन सा हो

सकती है? उपन्यासकारों ने भारी.भरकम विषयों के साथ बहुत छोटे
लेकिन प्रभावशाली विषयों को भी विषयवस्तु बनाया है।
उपन्यासकारों ने किसी विशेष कालखंड या घटना को लेकर भी उपन्यास
लिखे जिसने उस समय और आज भी पाठक वर्ग को प्रभावित किया, स्त्री.पुरुष
संबंधों को एक नया आयाम दिया और राजनीतिक चिंतन को सकारात्मक
सोच प्रदान की।
मनुष्य का प्रवृति होती है समस्या से भागना कोई तात्कालिक
समाधान -सजयूं-सजयना। मूल समस्या से हटकर तात्कालिक समाधान -सजयूं-सजयना
अर्थात् बाईपास। यह कलिकथा इसी की उपज है। शांतनु के शब्दों
में उपन्यास के अंत में उपन्यास का मर्म उद्घाटित होता है। ‘‘न
हमने किसी समस्या के कारणों को मिटाने की कभी कोशिश की, न ही
हर समस्या को बाईपास करने के रास्ते -सजयूं-सजय़ते रहे, पर अब तो कोई
बाईपास काम नहीं कर सकता है।’’

सोनिया

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