दोहे

1
कहते कहते कह लिया, दबी हुई हर बात।
समझ सको तो समझ लो, मेरे सब जज्बात।।
2
कारे बदरा झूमकर, बोले मन की बात।।
नाच मयूरी देखकर, झूम उठी बरसात ।
3
चूडी़ खन खन खनकती,सबको बहुत लुभाय।
छन छन पायल छनकती,
सुनकर मन ललचाय।।
4
कारे बदरा देखकर, नाचे दादुर मोर।
झूम उठी बरसात भी, मनवा भावविभोर ।।

5

लाल हरी भाये नहीं, बस भाये रंग श्याम

राधा से मीरा भली, मिल गये घनश्याम

6

हाथ सज़ा कर कह रही, सुनलो मेरी बात

समझ सको तो समझ लो, मेरे हर जज़्बात

7

साथी है सब काम के, सगा नहीं है कोय

मीत वही बन पायगा, संगी दिल जो होय

8

मां से ही अस्तित्व है, मां मेरी आधार !
मां से ही मैं पूर्ण हुं, मां है जीवन सार !

9

कोयल बन मैं गा रही, यह मन झूमा जाय।

बारिश की बूँदें पडी़ं, मन मयूर हर्षाय।।

10

बूंद-बूंद घट भर गया, बूंदे भयी हज़ार

बूंद बूंद गलती करी, बंद स्वर्ग के दुआर

(स्वरचित रचना )

लेखिका- जयति जैन “नूतन”, रानीपुर झांसी उ.प्र.

युवा लेखिका , सामाज़िक चिन्तक
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