साहित्य की अतृप्त इच्छा

 

जाने क्या लिखना चाहूं
जो अबतक अधूरा है
शब्दों की वर्णमाला
बहती भावनाओं में
मैं एक एक अक्षर जोड़ूं
और लिख दूँ पन्नों में
फिर भी कसक रह जाती
जो कभी पूरी न होती
हर अक्षर यहां मेरा
ओमकार बन जाए
मैं डूब जाऊं शिव में
शिव मुझमें बस जाएं
एक अध्यात्म बन जाऊँ
मुझे विवेकशील बनना
शब्दों को लेकर
आंसमा में उड़ जाऊं
सपनों की दुनिया में
खोयी अपने अंदर हूँ

रहती बाबरी बनकर
नहीं कुछ भी आता है
लोग बाबरी बोलें
एतराज नहीं करती
क्रष्ण तुझको लिख जाऊं
कहां कुछ वश में है मेरे
बैचेनी मेरी क्रष्णा तूही
अब मुझे समझता है

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  1. Sundar bhav

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