बुर्जग

बुर्जग

By |2017-11-20T10:29:29+00:00November 20th, 2017|Categories: कविता|1 Comment

 

पेड़ों से गिरते पीले पत्तों के जैसे
छोड़ जाते हमको बुर्जुग भी ऐसे
बुजुर्गों की रहती हम पर छाया
आशीर्वाद हमको मिलता ही रहता
बिन उनके दिल दुखी है हमारा
तेज धूप में जलती रेत के जैसा
मेरी निगाहें उनको ढूंढा करती हैं
आंखों में उनकी यादों के साये
खोया जैसे अनमोल खजाना
मां का आंचल नहीं मिलता
बचपन हमारा खो गया जैसे
अब बन गये हम भी बुजुर्ग के जैसे
हल्के पीले पड़ने लग गये
हम भी गिरते पीले पत्तों के जैसे

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  1. Sarvesh Kumar Marut November 20, 2017 at 7:20 pm

    ATI umda Khoobsurat bhav

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