नया रंग

हज़ूर, आज ये क्या नया रंग दिखा रहे हो,

छलक रही हैं आँखें और मुस्करा रहे हो,

 

फेर ली आपने नज़र जो यूँ हमें देखते ही,

खुद के वज़ूद से, मिलने से घबरा रहे हो,

 

समेट के सब, जो चल दिए हो दबे पाँव,

क्या खुद को खुद से ही अब चुरा रहे हो,

 

ये झटक के सर, खुली जुल्फ़ें लहराना,

खिली धूप को शाम का पता बता रहे हो,

 

देखिये तितलियों के साथ झूमते ये गुल हैं,

और आप हैं कि बेसबब ही शरमा रहे हो,

 

दिल के ये अरमाँ, अब रुकने से तो रहे,

बेवजह आप ये होंठ दांतों में दबा रहे हो,

 

‘दक्ष’ तो कब के हुए आप पे जां-निसार हैं,

ग़फ़लत में पड़े ये क्या अंदाज़ लगा रहे हो,

विकास शर्मा ‘दक्ष’

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