मदहोश

‘मदहोश’ न हो ऐ तकी इतना जहाँ ‘दिलकश’ नही,

मंदिर-ए-मस्जिद ढूंढता जिनमे है खूद का बस नही ।।

करले ‘मयस्सर’ रूह मे महबूब-ए-दिलवर व्दार मे,

‘जाजिब’बडा़ ‘जोै’ है बहुत परदे सियाह के पार मे ।।

काहिली को तोड़दे करले मकां को ‘जुस्तजू’

‘अब्सार’ ताके देखले पहचान अब ‘रहबर’ की ‘बू’ ।।

सोैहरत बला की ‘आतिशे’ अहजान है

‘गैहान’ मे,दुशवार न है राहें पर ‘उल्फत’ को रखले जान मे ।।

– मुकेश नेगी

गोैहरी माफी रायवाला,देहरादून

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