बही गंगा-जमुना आँखों में

सीताराम और हामीद दोनों बचपन के मित्र थे ।
सीताराम संस्कृत पढ़ के भागवत पंडित बन कर शहर जाकर बस गया था । हामीद ने दीनी तालीम ली और मदरसे में बच्चों को पढ़ाकर अपना गुजारा कर रहा था । दोनों के बच्चों की शादी-विवाह हो चुके थे । बहुत बरसों बाद होली पर सीताराम गाँव आया । आज अचानक उसे अपने बचपन के मित्र हामिद की याद आई । पूछने पर बताया कि – हाँ, वो अब भी गाँव में ही रहते हैं पर अब वो हमिदुल्ला मौलवी के नाम से जाने जाते हैं । सीताराम ने अपनी मौहल्ले के दुकानदार से हरी गुलाल खरीदी और पूछा- वो हामिद मौलवी अब कहाँ मिलेगा ?
ये सुनकर दुकानदार ने कहा- चाचा गाँव का माहौल अब पहले जैसा नहीं है चुनावों/गंदी राजनीति ने माहौल ही बदल दिया है आप वहाँ मत जाओ ! अरे भाई वो मेरा बचपन का साथी है, मैं उससे वर्षों बाद मिलूंगा भी और होली भी खेलूंगा । मौहल्ले वाले मना करते रह गये और सीताराम पंडित, मस्जिद के बाहर से आवाज लगाने लगे । अरे हामिद, हामिद ! देख कौन आया है ? निकल बाहर , निकल बाहर, देख तेरा दोस्त सीताराम आया है । मैंने सुना है अब तू हमिदुल्ला मौलवी बन गया है, बचपन का नाम भी याद रहा या नहीं । आसपास बैठे लोग बड़े आश्चर्य से उसकी बात सुन रहे थे । अपने नाम की पुकार सुनकर मौलवी मस्जिद से बाहर आया तो देखा एक पंडित उनका नाम पुकार रहा है । सीताराम ने कहा कि नीचे आता है या मैं ऊपर आऊं । हामिद को पहचानने में देर नहीं लगी दौड़ा और नीचे आकर गले से लगा लिया । दोनों मित्रों की आँखों से गंगा जमुना बहने लगी थी ।कुछ देर बाद हामिद ने पूछा ये हाथ में क्या है तेरे ? तो सीताराम ने कहा- गुलाल है तेरे लगाने को । अरे पर, मेरे पास तो है ही नहीं ठहर अभी मंगवाता हूँ । एक बालक को पैसे दे दुकान से लाल गुलाल लाने को कहा । करीब दो घंटे बाद रंगे-चंगे पंडित सीताराम को मौहल्ले वाले पहचान नहीं पा रहे थे ।

व्यग्र पाण्डे

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