हया

आज इस मुल्क और शहर को हुआ क्या है
सोचता हूँ की बाकी अब बचा क्या है
खुलेपन और सौंदर्य की चाह में
भूले, मान-मर्यादा और हया क्या है
राहें पतन की जब उन्होंने चुनी
वो बोले की इसमें नया क्या है
भेष बदले है अपने ही लोगों ने
अब पहचान खोने में बचा क्या है
क्या अब फिर से लौटेंगे वो खुशहालियां
उस सुन्दर चमन का पता क्या है

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Sanjay Saroj

हिंदी से स्नातक, नेटिव प्लेस जौनपुर उत्तरप्रदेश कविता, कहानी लिखने का शौक

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