फिर भी क्यों अनजान है हम

इस रंग बदलती दुनियां से परेशान है हम, अनजान है हम
समय का पहिया रुकता नहीं है फिर भी क्यों अनजान है हम ii
आया है याद वो फिर से अपना, बीत चूका है जो है सपना
बीता लड़कपन आई जवानी, कैसे कह दें की वो था अपना
भीड़-भाड़ की इस दुनियां में आज कितने बे जान है हम i
इस रंग बदलती दुनियां से परेशान है हम, अनजान है हम ii
यारों के संग धूम मचाना, गलियों में था आना जाना
खेतों में की वह हरियाली, चिड़ियों का था चह- चहाना
मानव की कु- बोली से आज कितने नादान है हम i
इस रंग बदलती दुनियां से परेशान है हम, अनजान है हम  ii
नदी का किनारा और साँझ की लालिमा लिए हुए
कल-कल करता बहता पानी, पूरी मस्ती लिए हुए
आज कहता है की सारे बीमारी की पहचान है हम  i
इस रंग बदलती दुनियां से परेशान है हम, अनजान है हम  ii
आज जो है, वो पहले ना था, ऐसे बयार है चली
भौतिक सुख के लोभ में आकर, आज की पीढ़ी कहाँ चली
ऐसी करनी से राम बचाए इंसान नहीं हैवान है हम
इस रंग बदलती दुनियां से परेशान है हम, अनजान है हम
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Sanjay Saroj

हिंदी से स्नातक, नेटिव प्लेस जौनपुर उत्तरप्रदेश कविता, कहानी लिखने का शौक

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