हम में से बहुत से लोग होते है जो की मन ही मन में हर इंन्द्रीय सुख को “सुखी” जीवन से जोड़ते हैं। लेकिन सुख केवल इंद्रिय विषयक नहीं है.
सुख और दुख तो हमारे मन की कल्पना मात्र है। अक्सर देखा जाता है की ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि वे तब और आनंद से रह पाते या उनका जीवन और ज्यादा सुखमय होता या खुद को सौभाग्यशाली मानते, जब उनके पास अमुक अमुक वस्तुएं होतीं। थोडा सा पैसा और होता या थोडा सा समय और मिल जाता तो ज्यादा सुखी होते। जबकि सच यह है कि जब हमारी आकांक्षाएं, लालसाएं और ऐसे दिखावे बढ़ते जाते हैं तो असंतोष ज्यादा बढ़ता है। यदि सुख और आनंद अपने अंदर नहीं मिल सकता तो यह कहीं भी और कभी भी नहीं मिल सकता। बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो हर स्थिति में दृढ़ रहता है और मौजूदा स्थितियों में ही आनंद ढूंढता है। मानव अंतर्मन में जितना ग्रहण करने की इच्छा होती है, उतना ही उसे ना पाने का दुख होता है। प्राप्त न हो तो भी दुख होता है। बहुत अधिक प्राप्त न हो तब भी इसका दुख होता है। कोई वस्तु प्राप्त होकर नष्ट हो जाए तब भी दुख होता है। जो दूसरों के पास है, हमारे पास क्यों नहीं है, यह सोचकर हम दुखी हो जाते है। जो मेरे पास है, वह दूसरों के पास भी हो तो तब भी दुख होता है। असल में, संतोष के अभाव के कारण हमारा जीवन दुखमय है। अगर संतोष नामक धन इंसान के पास हो तो वह सबसे धनवान हो जाता है/ किसी लेखक की लेखनी आज स्पष्ट रूप से यथार्थ होती हुई दिख रही है,

“गोधन, गजधन, बाजधन और रतन-धन खान
जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान

इसका मतलब यही है कि सबसे बड़ा धन ‘संतोष-धन’ है. दिन-रात मानव भौतिक सुखों को पाने की दौड़ में लगा है. और वह इसे ही अपनी सुख-शांति मानकर बैठा है, लेकिन स्थिति इसके विपरीत है, हमें सुख-शांति के बजाय दु:ख और अशांति मिलती है, इसका मतलब कहीं न कहीं हम गलत हैं.

और यह गलती है हमारी सोच की, हमारे विचारों की. जिस सुख-शांति-संतुष्टि को तुम बाहर धुंढ रहे हो, वह तो सदैव तुम्हारे अंदर है, बस केवल आपको अंतर्मुख होने की जरूरत है. जिससे सहज ही “सुख” की प्राप्ति होती है.

 

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