हर चेहरे के पीछे एक कहानी छिपी है
आँखो में आंसुओ का सैलाब रुका है

मुस्कान के पीछे दर्द पल रहे है
दिलो में जख्म रिस रिस के नासूर बन रहे है

मानसिक, आर्थिक या सामाजिक तनाव मिलते है
अपने भी जाने अनजाने तनाव दे जाते हैं

दबाव बना कर तनाव बढ़ाए जाते है
धीरे-धीरे सब रास्ते बंद हो जाते है

कब तक ये सिलसिला चलेगा
एक दिन तो सब्र का बांध टूटेगा

संजीव कुमार बर्मन

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