आत्म शक्ति

आत्म शक्ति

By |2017-12-24T11:33:59+00:00December 24th, 2017|Categories: आलेख|Tags: , , |0 Comments

विषय – आत्म शक्ति ।
विधा – आलेख ।

शरीर और आत्मा एक ही सत्य के दो छोर हैं जड और चेतन के स्वरूप का सम्मिश्रण हैं प्रसाद जी कामायनी का चिंता सर्ग के प्रथम रश्मि कण इसी तथ्य को उजागर करते प्रतीत है यथा –
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह
एक पुरुष, भीगे नयनों से, देख रहा था प्रलय प्रवाह।

नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन,
एक तत्व की ही प्रधानता, कहो उसे जड़ या चेतन।
यह दशा शरीर की ज्ञान चेतना का अहसास करवाती है, हम चेतन और जड के सम्मिलन का बिंब हैं और यह बिंब चेतना के बीज से अंकुरित संचालित और विलुप्त होता है, जड और चेतन की शक्ति या ऊर्जा के अपरिमित स्त्रोत देह से जुड़े हुए हैं चेतनावस्था की अनुभूति पर निर्भर करता है कि व्यक्ति या प्राणी चेतन की विशाल संपदा से कितना संग्रहित ग्रहण कर जीवन से जोड़कर अपनी आत्मा की शक्ति को बढ़ावा देता है ।
” गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात्” (कठोपनिषद १\२\१ १) व “(१\३\१) ” ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छाया तपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः।।” अथार्त ” शुभ कर्मो के कारण मानव शरीर मे आत्मा के उत्तम निवास स्थान ( हृदय ) में बुद्धि रूपी गुहा या कुंड मे छिपे हुए सत्य का पान करने वाले दो है , वे दोनो छाया और धूप की भाँति परस्पर विरोधी हैं यह तथ्य ब्रह्मवेता ज्ञानी कहते है, इस मंत्र मे कथित दोनों भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही है, इन्ही का वर्णन छाया और धूप के रूप मे हुआ है, परमात्मा सर्वज्ञ , स्व प्रकाशित धूप हैं तो आत्मा अल्पज्ञ किन्तु परमात्मा रूपी धूप का अंश है, छाया मे जो थोड़ा प्रकाश होता है, वह धूप का ही अंश होता है ।
इस कथ्य से स्पष्ट है कि आत्मा शरीर की चेतन कुंजी है जिससे शक्ति के अलौकिक भंडार फूटते है, पर यह व्यक्ति की जागरूकता पर निर्भर है कि भीतरी शक्ति की खोज के चक्षु माया बंधन से मुक्त होकर खुलते है या नही ।
शरीर का ही अदृश्य छोर आत्मा हैं यह जागरण दशा की अनुभूति पर निर्भर है, अधिकांश हम शरीर को ही आत्मा मान लेते है, इस भ्रांति के पिछे भी यही सत्य काम कर रहा है कि अदृश्य प्राणों के कोने मे प्रतीति है कि हम एक ही है, वही प्रसाद जी का दर्शन ” कहो उसे जड या चेतन ।” और इस प्रतीति से दो प्रकार की भूले हुई है, कि आध्यात्मिकता वादी कहता है कि शरीर है ही नही, आत्मा ही है । और एक भौतिकता वादी कहता है कि आत्मा होती ही नही । हम जटिल असमजस की दशा और विचारों के गुम्फन में जीवन बिता देते है और भीतरी आत्मीय शक्ति से अछूते रह जाते है, भीतर की चेतना का अवलोकन ज्ञान दशा के भीतरी चक्षु से संभव होता है और इस अनुभूति मे हम पाते है कि शरीर और आत्मा दो नही है, वे एक ही सत्य के दो पहलू होते है, इसलिए कोई योगी , साधक आत्मलोक की यात्रा शरीर से प्रारंभ करता है, पर यात्रा सूक्ष्म शरीर के धरातल पर निर्भर करती है भौतिक शरीर जड होने की दशा पर आध्यात्मिक यात्रा का श्रीगणेश संभव होता है, भीतरी शक्ति उदगम यही से झलकने लगता है, जीवन ऊर्जा का कुंड उस बिंदु की खोज, परिधि की शक्ति का केंद्र, और कुंडलिनी का जागरण यही से संभव होता है, कुंडलिनी जागी हुई शक्ति का नाम है, यही आत्मीक शक्ति नये द्वारों पर दस्तक देती है ……।
और जिन लोगो ने आत्मीय शक्ति के स्त्रोत जानने के प्रयोग किये, उन्हे भीतरी शक्तियों के अतींद्रिय अनुभव हुए हैं वे आत्म अनुभव, आत्म शक्ति और परमात्मा के स्व अंश होने का अहसास कर पाये है
” मै तुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या? ” महादेवी वर्मा ” मै ही राममय हुआ, शीश नवाऊ काहि । ” यह अनुभूति ठीक वैसी ही है जैसे सागर को किनारे से छूने लगा हूँ , या करोड़ो मील दूर गगन को छू रहा हूँ इस अति दैहिक आत्म अनुभूति का अहसास भीतरी शक्ति की वह हिलोर है जिसमे चेतन और जड एकानुभूति पाकर प्रखर ऊर्जा के स्रोत बन रहस्यानुभूति की परमावस्था को छूने लगते है …….।।।

छगन लाल गर्ग “विज्ञ”!

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