पिंजरे में मैना बंधन में नारी

एक मैना पिंजरे की कैदी
अतृप्त उसकी इच्छाएं
आंख से आंसू टप टप गिरते
पलकों में अभिलाषाएं
पंजों में धागे बंधे हुए
पिंजरा खुल भी जाता
उड़ उतना ही सकती
जितना मालिक चाहता
बंधन में रहकर भी
गीत सुरीले गाती
सबका मन बहलाकर
खुद भी खुश हो जाती
मैना ने छज्जे पर एक दिन
सुरीली कोयल को देखा
कुहकुह अपना प्यारा
राग सुनाती सबको
आंखों में आंसू भर मैना
कोयल से करुण स्वर में बोली
आजाद हो कितनी बहना
आसमान में उड़ सकती
चाहो तुम जिस डाल पर बैठो
नहीं बंधी सीमाएं
जाओ जियो जी भरकर
लक्ष्य को पाकर रहना

– नीरजा शर्मा

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