जमाना

हम हंसे ही नहीं जमानों से।
जी रहे हैं मगर बहानों से।

ओले ही यहाँ बरसते हैं।
हूँ परेशान आसमानों से।।

जहाँ कमाने वाले भूखे हों।
घिर गये हैं वो बेइमानों से।।

कोई आवाज मिल रही है मुझे।
मेरे बचपन के कुछ ठिकानों से।।

हम परेशान हो गए हैं अब।
अपने पाले हुए अरमानों से।।

गांव के पास अपने रहता हूँ।
भरा है घर मेरा मेहमानों से।।

अपने लोगों के बीच रहता हूँ।
मगर उम्मीद है बेगानों से।।

दिल का संगम हो चाहे नदियों का।
पाक होते हैं हम नहानों से।।
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**जयराम राय **

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