अन्तकरण में है मचा,
प्रलय का देखो एक कहर
हर कोई खुद में समेटे,
है यह कैसा एक समर
कोई तन्हा रुदन करता,
ओठों पे मुस्कान धर
पर निरंतर चल रहा
स्वत:में कैसा यह समर
ओरों से जब युद्ध हो
तो जीतता हर एक नर
जीत में भी हार का
अंतर्मन का है समर
है कल्पित कुंठित शोषित
विचारों की एक आग है
आग के ही साथ में
चल रहा है यह समर
अपने रचे ही व्यूह में
है घिरता कैसे यह नर
कि स्व विचारो से ही निर्मित
है हुआ स्व का समर

लेखक / लेखिकाडॉ. वंदना मिश्रा

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