माना न थे तुम कृष्ण,

न हम ही थे सुदामा

पर कम नही कुछ इससे,

था अपना भी याराना

दूजा न कोई इसमें ,

कभी और रह सकेगा

तेरी दोस्ती के आगे ,

न कोई पहुच सकेगा

तेरे चले जाने से  ,

हूँ रिक्त मैं विराना

एक बार फिर से आके ,

सुना दे मधुर तराना

मैं हूँ क्षत विक्षत सा ,

कराहता हूँ हर पल

बस मौन है अभिव्यक्ति ,

समझ ले तू जरा सा

टुटा हूँ हर कदम पर ,

न संभल सका मैं खुद में

एक बार फिर से आके,

बस देख ले तू खुद से

हे सखे है तुम से ,

इतनी अरज हमारी

अगले जन्म भी हमसे ,

इतनी ही करना यारी

लेखक / लेखिकाडॉ. वंदना मिश्रा

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