प्रेम पत्र

सुनो!
याद है तुम्हें
वो जब मैं
प्रेम पत्र लिखती थी तुम्हें
आस पास ही रहते थे
फिर भी
जो बातें कह नहीं पाती थी
उन्हें काग़ज़ पे लिख कर के
दिया करती थी मैं तुमको
हमेशा चाह रहती थी
कभी तुम भी मुझे कुछ दो
मगर ये जानती थी मैं
कि तुम लिखने से बचते हो
पर तुम्हारे अधरों की
वो मंद शरारत भरी मुस्कुराहट
बहुत कुछ बोल जाती थी
अजब अंदाज़ का वो
प्रेम पत्र
आज भी याद है मुझको
सुनो!
हम अब भी साथ रहते हैं
नई चाहत ये जागी है
कि फिर एक
प्रेम पत्र लिखूँ
तुम्हारे हाथ में रखूँ
जवाबन कुछ ना बोलो तुम
मगर एक बार फिर यूँ ही
शरारत से मुस्कुरा दो तुम।

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