ग़म अब नहीं होते हज़म

ग़म अब नहीं होते हज़म, चेहरे पर साफ़ नज़र आता हैं
अब तक ग़मो को दफ़न कर, झूठी हँसी चेहरे पर सजाते रहे हैं

बनावटी पन की प्रतिस्पर्धा में अंधा बन दौड़ते रहे है
अपना रुतबा बढ़ाने को, झूठी शान दिखाते रहे है

बस अब नहीं सहा जाता, बगावत को दिल करता है
घुट-घुट के बहुत जी लिए, अब खुल के जीने को दिल करता है

जैसे है वैसे ही रहेंगे, जो दिल-दिमाग में है वही कहेंगे, वही करेंगे

दिमाग में कोई तनाव ना लेंगे, आत्मा पर कोई बोझ ना लेंगे

संजीव कुमार बर्मन

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