काश !तुम रूबरू होते … (ग़ज़ल )

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काश !तुम रूबरू होते … (ग़ज़ल )

(मेरे अज़ीज़  फनकार के नाम प्रेम -पत्र )

 

ऐ मेरे हमदम ,हम राज़ ,काश तुम रूबरू होते …

यूँ  तो हो जाता है दीदार ,तुम्हारी तस्वीर से मगर ,

क्या   लुत्फ़  होता  गर  तुम  हमारे   रूबरू होते .

एक   झलक  या   महज  तुम्हारा   साया   ही सही ,

कुछ  तो होता   हासिल , अरमान  अधूरे  न  होते .

वोह  मीठी सी  निगाह और वो तबस्सुम  तुम्हारा,

हम भी  थे जिनके कायल ,हम पर मेहरबान होते .

हसरत  तुम्हारे  कदम बोसी की थी ,नवाज़ने  की ,

तुम्हारी  इबादत करते , तुम्हारे कद्रदानो में होते.

तुमसे  गुफ्तगू -ऐ- आरजू  थी ,बस कुछ लम्हों की ,

मुलाकातों  के  वोह नगीने हमने संजो कर रखे होते.

तुम्हारी  बलाएँ  लेने को  खड़े होते  क़ज़ा के मुकाबिल ,

तो  तुम्हारी  और  उस  गुस्ताख  के  इशारे  न होते.

मगर  हाय  यह कम नसीबी  और  बेरहम  कुदरत ,

आ गयी  हमारे दरम्याँ  , वर्ना  तुम हमारे रूबरू होते.

 

 

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संक्षिप्त परिचय नाम -- सौ .ओनिका सेतिया "अनु' , शिक्षा -- स्नातकोत्तर विधा -- ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

2 Comments

  1. Subodh January 1, 2018 at 11:52 pm

    बहुत बढ़िया क्या बात कह दी

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  2. Onika Setia January 4, 2018 at 1:02 pm

    thanks a lot sir

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