विचित्र प्रश्न

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विचित्र प्रश्न

By |2018-01-20T17:07:43+00:00November 27th, 2015|Categories: कविता|0 Comments

जो जले हो आग में तो उसको बुझाया जाए,

क्रोधाग्नी में जो जले उसे कैसे बुझाया जाए!

 

अगर जो रूठे लाड़ में तो उसको मनाया जाए,

बिना रूठे जो न बोले उसे कैसे मनाया जाए!

 

हो अगर प्रेम तो पूजन का भाव हो जाए,

स्वार्थ से जो हो घिरा उसे प्रेम कैसे माना जाए!

 

हो अगर भूल तो उसको सुधरा जाए,

जान के जो भूल हो तो कैसे भुलाया जाए!

 

सोते हुए को जगाना है मगर आसान फिर भी,

खुली आंखों से जो सोए उसे कैसे जगाया जाए!

 

गिर रहा हो कोई अगर उसको संभाला जाए,

मगर जो गिरे जान के उसे कैसे उठाया जाए!

 

हैं बड़े विचित्र प्रश्न कैसे बताया जाए,

जान के जो अंजान बने उसे बतलाया जाए।

लेखक / लेखिकाडॉ. वंदना मिश्रा

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