बालमन वास्तव में कच्ची मिट्टी- सा होता है, जिस रंग-रूप-आकार में ढालो, ढलता जाता है और यही सुंदरता उनकी बातों से निखरकर सामने आती है। गाँव के एक प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक ने बच्चों के मानस-पटल पर बिखेरे शिक्षा के रंग और जब लिखवाई उनसे “मन की बात”, जिसका शीर्षक था “बेटी बचाओ-बेटी पढाओ” तो बच्चों ने बहुत ही खूबसूरती से पोस्टर पर अपने मन की बात लिखी।
काजल ने लिखा “बेटियाँ घर की लक्ष्मी कही जाती हैं। बेटियों से ही सारी दुनिया है, बेटी नहीं रहेगी तो दुनिया कैसे रहेगी।”
सृष्टि ने लिखा ” बेटी पढेगी तो अच्छा संस्कार सीखेगी और पुरुषों के बराबर खड़ी हो सकेगी।
और भी बच्चों ने यूँ लिखा कि ” बेटी पढेगी तो बोझा नहीं ढोएगी और गोबर नहीं पाथेगी, अच्छा नौकरी करेगी।”
“बेटियों का पढना जरूरी है, तभी भ्रूण हत्या नहीं होगा और अच्छा पति और ससुराल मिलेगा।”
“बेटी पढेगी तो अच्छा परिवार बनाएगी और सबको पढाएगी।”
“लड़कियाँ शिक्षित होंगी तो दहेज के लिए घरों में जलाई नहीं जाएंगी।”
ये तो कुछ उदाहरण मात्र हैं। किसी भी बदलाव की शुरूआत बच्चों से करें तो वो निश्छल रूप से प्रभावी होती है क्योंकि यही वो कलियाँ हैं जो कल फूल बन खिलेंगे, खुशबू बन महकेंगे, इबारते लिखेंगे नई-नई।
ऐसे ही एक बार जब शिक्षक ने बच्चों से उनके व्यवहार पर मन की बात की तो कुछ चर्चा के बाद बच्चे स्वयं ही बताने लगे ‘क्या करें सर, आदत-सी पड़ गई है। गाली ना दो तो भी मुँह से निकल जाती है।’ कच्ची मिट्टी के घड़े जैसे, कि माँजो तो सँवर जाएं।
अगले दिन से सबको गिन के आना था कि आज कितनी गालियाँ दीं। और देखते-देखते ये आदत ही बदल गई, व्यवहार ही बदल गया बच्चों का। ये जब बड़े होंगे तो परिवेश के साथ जैसे भी ढल जाएँ, लेकिन इनकी आत्मा में शुद्धता का ये अंश तो रहेगा ही। ये ऐसे समाज के द्योतक बनेगें जहाँ प्यार और अपनापन पनपेगा। ये बच्चे ही तो कल हैं, क्यों ना इन्हे ऐसे सँवार दें कि बड़े होकर ये छायादार वृक्ष बनें। मानवता का प्रतीक बनें।

आकांक्षा

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