हमारी सोंच

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हमारी सोंच

By |2018-01-20T17:04:16+00:00January 2nd, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

आते हैं चले जाते हैं,  हम तो सिर्फ सोंचते रह जाते हैं

किस कदर हम सोंचे किस रिस्ते को, यहाँ तो हर रिस्ते बिक जाते हैं

दुनियाँ का अजब दस्तूर है, हर एक जिन्दगी का अपना रूप है

अल्ला के हम सब बंदे हैं, पर दौलत में सब अन्धे हैं

दिखने में तो गोरे चंगे हैं, सबके अपने गोरख धन्धे हैं

इस जहाँ में नहीं कोई अछूता है, दौलत ने ही सबको लूटा है

दौलत का नशा इस कदर छाया है, दुनिया में परचम लहराया है

ऐसी दौलत को मार दो ठोकर, जिसमें अपना सगा भी पराया है

नहीं जोड़े जो अनमोल रिस्ते, सिर्फ ख्वाबों का महल सजाया है

वक्त ढलने से पहले ठहर जा “सुभाष”, वर्ना तू ये सोंचता रह जाएगा

कि लोग आते हैं चले जाते हैं, बस सिर्फ सोंचते रह जाते हैं

सिर्फ सोंचते रह जाते हैं…………….

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