आँखों के कोर से जो निकल कर मेरे आंसू
जब कपोल से लुढ़क कर मुख पर आते है
तो मानो कोई झरना ऊंची कंदराओं में से
बहकर सीधा अपने नदी से मिल जाते है
और यही आंसुओं के कुछ बूंद मिलकर
उस कड़वे स्वाद कि याद दिला जाते है
जो तुने दिए थे मुझे, और खून के आंसू
खुद आज अपने आप ही पिये जाते है
अब तो ऐसी हालत में बस रोना ही है
जो नहीं जानते प्यार वो भी किये जाते है
तेरा दिया हुआ जख्म नासूर न बन जाये
यही सोच कर उस जख्म को सिये जाते है
नादान है वो क्या जाने कि तड़प क्या होती है
और जानकर भी हम ये गुनाह किये जाते है

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