युनानी नगर-राज्य(city-state) की गहरी छाप युनानियों के चिन्तन पर पड़ी है.यह आज के नगर से पुरी तरह भिन्न है.आज का नगर एक भौगोलिक इकाई है जबकि इसके ठीक विपरीत युनानी नगर-राज्य एक सामाजिक इकाई था.इसका एक सामान्य लक्ष्य और जीवन था.वहाँ के निवासी एक दूसरे के सामाजिक जीवन में भागीदार थे और उनमें एक प्रकार का सौहार्द्र था.

बार्कर के शब्दों में , ” यह एक सामान्य जीवन का स्थान था.यह विभिन्न वर्गों का संघ था.”(वर्ग – Class को समझना बहुत जरुरी है,जो आर्थिक स्थिति पर आधारित है न कि जातिगत)

आधुनिक नगर-राज्य केवल व्यापार और उद्योग-धन्धों के केंद्र हैं इनका कृषि से कोई संबंध नहीं है, जबकि युनानी नगर-राज्य में व्यापार,उद्योग,शिल्प-कला तथा कृषि सभी कुछ का समावेश था.
युनानी नगर-राज्य की जनसंख्या भी सीमित थी.प्लेटो ने 5040 रखने की सुझाव दी है तो वही अरस्तु ने 10000.
अरस्तु के विचार से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि राज्य में ही नागरिकों का समग्र सामुहिक जीवन निहित था,राज्य के बाहर तो नागरिकों की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी.
वहां धर्म एक सार्वजनिक कर्तव्य था और राज्य का अभिन्न अंग था.इसे धार्मिक उत्सव के रुप में नागरिक स्तर पर मनाया जाता था.जिसकि पुष्टी बार्कर ने अपनी किताब ‘greek political theory ‘ में किये हैं.ईस पुस्तक का आदि वाक्य है – ” राजनीतिक चिन्तन के जन्मदाता युनानी हैं.इसका मूल स्त्रोत युनानी मस्तिष्क का शांत एवं स्पष्ट बुद्धिवाद है.”

उपर्युक्त सत्य को यह कहकर भी अभीव्यक्त किया जाता है कि ” मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है.” अर्थात सामाजिक जीवन से अलग और स्वतंत्र मनुष्य की कल्पना नहीं की जा सकती.मनुष्य अपनी मानवता का विकास समाज में रहकर ही कर सकता है.समाज का सदस्य रहकर ही वह जीवित रह सकता है.समाज में ही वह जन्म लेता है,समाज ही उसका पालन पोषण करता है,समाज ही वह सामग्री और परिस्थितियाँ जुताता है जो उसके विकास के लिये परमाआवश्यक है.

अंत में हम कह सकते हैं – जीवन और राजनीति में वहाँ इतनी घनिष्ठता थी कि अरस्तु को कहना पड़ा – ” मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. “ जिसका अभीप्राय था – “मनुष्य एक राजनीतिक प्राणी है.”

– सुरेश कुमार पाण्डेय

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