सीधी रेखाओं से
बहुत ही सरल आकृतियां
बनती रही हमेशा
और मई उनमे ही खोजता रहा तुम्हें

तुम्हारा सौंदर्य
तुम्हारा प्रेम
तुम्हारी चंचलता
अल्हड़ता
कितना कुछ खोजता था
उनमें

पर तुम हरगिज
नहीं थी उनमें

रेखाओं को थोड़ी
वक्रता दी
तो लो तुम चिहुंक उठी

जी उठी
जैसे फूंक दिए हों
प्राण किसी पाषाण में

अब तुम्हारी तस्वीर
मेरे ह्रदय के कैनवास पर
ज्यादा मुकम्मल बन रही है

सुधीर देशपांडे

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