आलोचनाओं से न डर

रहो पथ पर तुम अड़े

कीचड़ उछालने को यहाँ

है बहुत पत्थर पड़े

तेरे प्रयासों की यहाँ

नही किसी को कद्र है

तेरे पगों को रोकने

हैं यहाँ बहुत खड़े

तूने समझा है इन्हें

अपने ही जैसा एक सक्श

पर मगर है इनमे भी

कितने किस्म के केकड़े

तेरे पगों को रोक कर

भर देंगे उनमे जख्म ये

अपने कदम को इसलिए

रख हमेशा ही बढ़े।।

लेखक / लेखिकाडॉ. वंदना मिश्रा

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