मिलन और विक्षोह की अद्भुत लीला,

हृदय को याद आया तेरे मिलन की रैना,

गोद मे सर रख तुमने प्रेम की अनगिनत

बाते कही थी,

वो सांझ की लालिमा मन को,

भाव-विभोर कर देता था,

वो मृग-नैनी सी आँखे,

मानो हृदय को बाँध लेता था,

मिलन की वो बेला,

मानो पकड़ लेने को जी चाहता,

प्रेम तन नही माँगता,

वो तो मन का प्यासा होता है,

हृदय के मन-मंदिर मे,

विराजमान होता है,

यादो की वो झड़ी ,

मानो खत्म ही नही होती,

विक्षोह के पल पलको को,

नम कर जाते है,

तुम मेरी प्रिया……..सदा मेरे हृदय मे रहोगी।

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