गिरती बुँदे तरूओ से छन कर,

मेरे मुख-मण्डल को भिगो रही है,

मधूर उषा की अँगराई,

मेरे रोम-रोम को महका रही है,

मेरा हृदय अठखेली करता वाचाल पलो मे,

तेरे प्यार का तब्बसुम

आरोही-अवरोही कर रहे है,

क्षितीज छोर पर दीप्ती -भाल

मेरे सौदर्य को दमका रहे है,

मै रक्तिम-स्वर्णिम पथ पर बैठी,

महसूस कर रही हूँ तुम्हे,

हृदय गगन पर छाया है ऐसे,

तेरे प्यार का तब्बसुम

मानो मै संगिनी हूँ तेरे जीवन का…।

 

 

 

Rating: 4.8/5. From 2 votes. Show votes.
Please wait...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *