शायद वहीं तक है मेरे देश की सरहद
जहां तक बिना रोक टोक के
जाना हुआ
जहां तक मेरी स्वतंत्रता छिन्न भिन्न न हुई
जहां तक सांस लेने में दम नही घुटा
जहां तक अविश्वास की अवधारणा ने
मन में घर नही कर लिया

भेदभाव के दंश से गुजर कर लगा कि
समानता मात्र एक शब्द है
किसी शब्दकोश का
गैर समुदाय के सम्बन्ध में लगे
प्रेवश वर्जित, निषेध के बोर्ड
धार्मिक, मानसिक स्वतंत्रता का हनन लगे
जिनके लिए कानून की देवी ने भी
बांधे रखी पटटी आंखों पर
सदियों सदियों से

नुक्कड़ पर बनी चायशालाओं में
कहीं फक्टरियों के धुंए में कैद बचपन
देखकर लगा कि
शिक्षा का अधिकार कानून इन पर लागू ही नही होता
जब बच्चे काम पर जा रहे होते हैं
तो राजेश जोशी की कविता
मातम मना रही होती है शिक्षा के अधिकार पर

जब विचारों पर कानून की धाराओं का
असंगत विवरण उकेरा जाए
आत्माभिव्यक्ति के मुखर मौन पर
प्रतिबन्ध का टैग लगा दिया जाए
ऐसे में सैंवधानिक विचारों का मौलिक अधिकार
एक महान पुस्तक का सुन्दर वाक्य हो सकता है
रक्षक नही

शोषित पददलित की आंखों में व्याप्त आक्रोश
घोर अपराध की श्रेणी का उदाहरण होते हुए भी
जब महत्वहीन हो जाए
ऐसे में कितना मूल्य रह जाता होगा
शोषण के विरूद्ध अधिकार का
गंभीर विषयों का हनन
एक चिंतित प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह है
जो संविधान की प्रथम पंक्ति
हम भारत के लोग
पर दर्ज है किसी हल्फिया बयान की तरह

बहुत ही सुक्ष्म गति से गतिमान है
हनन का चक्र
इतना सब कुछ घटित हो जाने पर
लगता है कई बार
बहुत सीमित है मेरे देश की सरहद
शायद वहीं तक
जहां तक मेरी स्वतंत्रता छिन्न भिन्न न हुई
जहां तक सांस लेने में दम नही घुटा।

लव कुमार लव

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