सुरेश कुमार पाण्डेय, ‘हिन्दी लेखक डॉट कॉम’ के लिए

      म्यांमार में लोकतंत्र की विजेता ‘आंग सान सू की’ की पार्टी एनएलडी(नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी) गत दिनों हुए चुनावों में जरूरी दो तिहाई बहुमत पा ली है। 1990 के बाद म्यांमार में सू की की पार्टी का यह पहला चुनाव है। जिसके जरिये एनएलडी को निचली और ऊपरी सदन में नियंत्रण मिल गया है। अब यह पार्टी राष्ट्रपति का निर्वाचन और सरकार का गठन कर सकती है।

      इस चुनाव में पुराने दिनों की अपेक्षा सैन्य प्रतिष्ठान संयत रहे हैं लेकिन फिर भी व्यापक शक्तियां इनके ही हाथों में है। चुकि सू राष्ट्रपति पद पर आसीन नहीं हो सकती,कारण कि संविधान में वर्णित प्रावधान बाधा पैदा करते हैं। साथ ही सेना के लिए यह संविधान 25 फीसदी सीटें भी आरक्षित करता है। लेकिन एक बात तय है जो म्यांमार के ही स्वतंत्र विश्लेषक रिचर्ड होर्से के शब्दों में कहा जा सकता है,”एनएलडी जो भी नियम पारित करना चाहेगी ,वह कर सकेगी,उन्हें गठबंधन और किसी समझौते की जरुरत नहीं पड़ेगी।”

       थीन सीन की सत्ताधारी यूनियन सोलेडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी(यूएसडीपी) आसानी से इस चुनाव में हार गयी है। बाकी सभी छोटे दल हाशिये पर चले गए हैं। यूएसडीपी पुराने सैन्य कार्यकर्ताओं से बनी पार्टी है। 2011 में सरकार का नेतृत्व करने के लिए अपनी वर्दी छोड़ कर असैन्य वेश धारण करने वाले पूर्व जनरल थीन सीन को सुधारों की शुरुआत के लिए सराहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने भी सुधार प्रक्रिया के नेतृत्व के लिए थीन सीन के साहस और सोच की सराहना की है।
म्यांमार में नए युग का आगाज:एक विवेचना
      सू की की पार्टी म्यांमार में एक बड़ी पार्टी बन गयी है,लेकिन इस निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाजी होगी कि इस आम चुनाव के बाद म्यांमार में फ़ौजी बूटों का हलचल कम हो पाएगी,कारण कि 1990 के चुनाव में भी एनएलडी को सफलता मिली थी,पर सेना ने उस चुनाव को खारिज कर दिया था। परन्तु स्थितियां आज बदल गयी है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का काफी दबाव तथा आर्थिक नाकेबंदी ने म्यांमार और यहां की फ़ौजी सत्ता को तोड़ कर रख दिया है। सुधार ही वह रास्ता है जिसके बदौलत म्यांमार मुख्यधारा में आ सकता है।

      दरअसल सैन्य शासन ने 2011 में भी राजनीतिक सुधारों की पहल की तो इसका भी कारण यहीं था कि अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण यह दुनिया से अलग-थलग पड़ गया था।

       लोकतंत्र को कुचलने के लिए सेना ने 1990 से ही आंग सान सू की को नजरबंद कर रखा था। परन्तु नवंबर 2010 में विश्व विरादरी के प्रयासों और दबावों के चलते नजरबंदी हटानी पड़ी। 2010 में ही म्यांमार में चुनाव हुआ। लेकिन इसका महत्त्व इसलिए नहीं रहा क्योंकि सू की ने उस चुनाव का बहिष्कार किया था कारण कि इनको अंदेशा हो गया था कि चुनाव साफ़-सुथरा नहीं होगा,जिसकी पुष्टि अंतराष्ट्रीय मीडिया ने भी की और कई धांधली का उल्लेख किया। अब मुख्य सवाल यह है कि क्या फ़ौजी हुकूमत 2015 के चुनाव के जनादेश का सम्मान करेगी?
2008 में लागू संविधान 

       2008 में जो नया संविधान लागू किया गया था वह लोकतंत्र के भावनाओं के प्रतिकूल था। जनता के बहिष्कार के बावजूद सैन्यतंत्र ने इसे जबरन लागू किया। इसमें कई आपत्तिजनक प्रावधान है जैसे कि संविधान का अनुच्छेद 59F कहता है,’अगर किसी के पास विदेशी संतान हो तो वह राष्ट्रपति नहीं बन सकता।’ सू की के दो पुत्रों के पास ब्रिटिश नागरिकता है। इसी तरह सेना के लिए एक चौथाई सीट भी आरक्षित है।

म्यांमार की आतंरिक परेशानी और सू की के लिए चुनौती 
       म्यांमार की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो गयी है इसको पटरी पर लाना इनके लिए मुख्य चुनौती होगी। बहुत सारे जनजातीय समाजों वाले इस देश में हिंसा हमेशा होती रहती है। तानाशाही हुकूमत में यह परदे के पीछे रह जाता था लेकिन अब सतह पर आयेगा जिससे निपटना सू की की दूसरी बड़ी चुनौती होगी।
      सबसे बड़ी चुनौती जिसके ओर सभी का ध्यान आकृष्ट हुआ है,वह है-दुनिया की बड़ी ताकतों में केवल चीन ही जुंटा का साथ दिया। बदले में चीन ने अपना पैर खूब पसारा। निवेश से लेकर कूटनीतिक स्तर तक म्यांमार को अपने पर आश्रित बना लिया। अब सू की को ही विदेश नीति के मामले में ध्यान देना होगा कि वह किसका ज्यादा रुख करेगी भारत का या चीन का?
      म्यांमार का अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमान शायद दुनिया की सबसे पीड़ित समुदाय है। इन्हें यहां मताधिकार भी प्राप्त नहीं है। इन्हें बौद्धों द्वारा काफी पीड़ित किया जाता है। ये अलग शोध का विषय है कि आखिर क्या कारण रहा कि अहिंसक बौद्ध श्रीलंका और म्यांमार जैसे कई देशों में हिंसक हो गए है?
आंग सान सू की का वर्तमान व्यक्तित्व 

     काफी दिनों तक नजरबन्द रहने के बाद 1990 के अपेक्षा ये काफी समझदार और मानसिक स्तर पर मजबूत हो गयी हैं। इनको अभास पहले से ही है कि बिना सेना की सहायता के वह म्यांमार में लोकतंत्र की डगर को ज्यादा दिनों तक नहीं चला पाएगी। इसी कारण उन्होंने कहा कि वे राष्ट्रपति से ऊपर रहकर शासन करेंगी। जो वहाँ के लोगों को काफी प्रभावित किया।

1989 से लेकर 2010 तक सू की नजरबन्द रही। इनकी इसी नजरबंदी में इनकी पूरी जवानी निकल गयी। अगर इनके जीते जी म्यांमार में एक सशक्त लोकतंत्र स्थापित हो जाएगा तो इसकी कीमत पूरी की जा सकेगी।       हालांकि लोकतंत्र कोई राकेट साइंस नहीं है जो रातों रात आ जाएगी,यह एक प्रक्रिया है,जो लोगों में स्वतः प्रेरणा देता है। भारत भी लोकतांत्रिक देश बनने की प्रक्रिया में है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सू की अब सभी कदम समझदारी से उठायेगी और म्यांमार में लोकतंत्र के दिन को बहुरेगी।

आखिर अब क्या?
म्यांमार के सैन्य प्रशासकों को समझना होगा कि लोकतंत्र में ही म्यांमार के लोगों का भविष्य सुरक्षित है। सैन्य शासन के दौरान म्यांमार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक छाप धूमिल पड़ति गयी। इसकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि कभी दूसरे देश को धान निर्यात करने वाला यह देश आज अपनी जरूरतों के लिए खुद आयात कर रहा है। सागौन की लकड़ियों के लिए यह दुनिया भर में विख्यात है,आज इसकी तस्करी चरम पर है। कच्ची अफीम की आमदनी से इसकी आय जरूर बढ़ी है लेकिन इसकी कीमत यहां के युवाओं को चुकानी पड़ रही है। अगर म्यांमार को तरक्की के रास्ते पर चलना है तो लोकतंत्र को अपनाने के लिए यहां के सैन्य शासकों को भरपूर सहायता देना चाहिय्र तभी इसे अंतर्राष्ट्रीय मदद मिल सकती है।

म्यांमार और भारत 
अगर म्यांमार में चीन का प्रभाव कम हो रहा है,तो इसका कारण भारत है। भारत काफी ज्यादा दबाव बनाया हुआ है। नजरबंदी से छूटने के बाद सू की सबसे पहले दिल्ली आयी थी। यहां उनका जोरदार स्वागत किया गया था,जो भारत और सू की के रिश्ते को स्पष्ट करता है।

भारत के लिए म्यांमार का खासा महत्व है। दक्षिण एशिया में भारत की सारी नीतियां चाहे वह लूक ईस्ट पॉलिसी हो या एक्ट ईस्ट पालिसी सभी म्यांमार से ही शुरू होता है। जो म्यांमार के बिना चल भी नहीं सकता।        भारत द्वारा रिश्ते प्रगाढ़ करने के और प्रयास किये जाने की जरुरत है। पुराने और ठंढे बस्ते में पड़ी परियोजनाओं को अमल में लाने की जरुरत है। जैसे भारत-म्यांमार-थाईलैंड सड़क मार्ग का विकास आदि।
मोदी ने म्यांमार के महत्त्व और रिश्ते को 3C के जरिये व्यक्त किया जिसका तात्पर्य है कॉमर्स(इरावदी नदी में पोर्ट);कल्चर(बौद्ध); और कनेक्टिविटी(भारत-म्यांमार-थाईलैंड सड़क मार्ग)। इसके बदौलत रिश्ते को और प्रगाढ़ किया जा सकता है।

– सुरेश कुमार पाण्डेय

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