हिन्दी की दुविधा

हिन्दी की दुविधा

By |2018-01-20T17:04:08+00:00January 11th, 2018|Categories: आलेख|Tags: , , |0 Comments

हिन्दी साहित्य एवम भाषा की उत्पति और विकास के बारे में अग्रगण्य विद्वानों का भिन्न भिन्न मत रहा है। उनके मतों का अवलोकन करने पर यह निष्कर्ष स्पष्ट होता है कि हिन्दी का साहित्य प्राचीनतम और अत्यंत विस्तृत है। सुप्रसिद्ध भाषाविद ” डॉ हरदेव बाहरी “के शब्दों में, हिन्दी भाषा का इतिहास वैदिक समय से ही प्रारम्भ होता है। काल कालांतर में इस भाषा के नाम का परिवर्तन इस भाषा के लिए दुर्भाग्यपूर्ण ही रहा है। कभी वैदिक संस्कृत , कभी प्राकृत, कभी पाली , कभी अपभ्रंश और अब हिन्दी। आलोचकों का मत हो सकता है कि वैदिक संस्कृत और वर्तमान हिन्दी में आसमान-जमीन का अंतर है। परन्तु ध्यान देने योग्य यह है कि हिब्रू, रुसी, चीनी, जर्मन, तमिल आदि जिन भाषाओँ को बहुत पुरानी बताया जाता है, उन भाषाओँ के वर्तमान और प्राच्य रूप में जमीन – आसमान का अन्तर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उन भाषाओँ के नाम नहीं बदले गए हैं, उन्हें प्राचीन और आधुनिक रूप कहा गया है। परन्तु हिन्दी के साथ ऐसा नहीं हुआ, हर युग में हिन्दी को एक अलग ही नाम से सम्बोधित किया जाता रहा।

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