संस्कार
अनिल “क्या मां आजकल बाबूजी को क्या हो गया है जब देखो वह पूनम और रवि को संस्कारों का भाषण देते रहते हैं| और घर में कोई भी रिश्तेदार या उनके मित्र आते हैं तो वह पूनम( अनिल की पत्नी) रवि (अनिल का पुत्र )को बुलाने लगते हैं, हर किसी से मिलाना या नमस्कार करना जरूरी है हमारे पूरे परिवार का?
अनिल ने चिढ़ते हुए अपनी मां को उलाहना दिया|
मां ने कहा” मैं बाबूजी को समझा दूंगी वह पुराने जमाने के हैं और पूनम अगर ना मिलना चाहे तो चाय बना कर दे दिया करें मैं ले जाऊंगी”|
अनिल “जमाना कहां बदला है मां | बाबूजी बदल गए हैं वह भी तो जब दादी बाबा किसी से भी मिलने को बुलाते थे तो आपको कहते थे कि “इनका तो रोज का रिश्ते नातेदारों से गप्पे लड़ाना और खातिरदारी करना शौक है हम कब तक इनके रिश्ते और व्यवहार को ढोते रहेंगे और मां आप भी तो दादी को यह कह देते थे “मैं चाय बनाने के लिए थोड़ी ही दिन भर किचन में बैठी रहूंगी मुझे अनिल को पढ़ाना भी होता है”| मां के पास अनिल को कहने के लिए शब्द नहीं थे|

अनिल के पिता जी यह सब सुन रहे थे और वेे अनिल की मां के सामने देखते हुए सोचने लगे कि “हमने अपने बच्चों को संस्कार तोड़ने के लिए खुद ही मजबूर किया है…अब शिकायत करें भी तो किससे ?”

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