मेरा पता जा रहा है

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मेरा पता जा रहा है

By |2018-01-20T17:04:06+00:00January 18th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |1 Comment

सवार चार काँधो पे होकर मेरा पता जा रहा है
हुई है मौत मेरी कुछ ऐसा सुना जा रहा है

भिंचे हैं होठ जो न बोलते थे इक हर्फ भी
शोर उनका वो कानों तक चला आ रहा है

न थी इजाज़त उस पागल झकोरे को भी
माथा वो होके पागल झरोखे से अथड़ा रहा है

पाकीज़ा उल्फत का ही सदका है “शादाब”
बाकी तो बस जिस्म ही जिस्म से टकरा रहा है।

दीपचंद महावर “शादाब”
दाहोद (गुजरात)

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One Comment

  1. admin January 18, 2018 at 12:54 pm

    बेहद खूबसूरत रचना

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