सवार चार काँधो पे होकर मेरा पता जा रहा है
हुई है मौत मेरी कुछ ऐसा सुना जा रहा है

भिंचे हैं होठ जो न बोलते थे इक हर्फ भी
शोर उनका वो कानों तक चला आ रहा है

न थी इजाज़त उस पागल झकोरे को भी
माथा वो होके पागल झरोखे से अथड़ा रहा है

पाकीज़ा उल्फत का ही सदका है “शादाब”
बाकी तो बस जिस्म ही जिस्म से टकरा रहा है।

दीपचंद महावर “शादाब”
दाहोद (गुजरात)

Say something
Rating: 3.3/5. From 3 votes. Show votes.
Please wait...