चांदनी रात तेरा एहसास कराती है
तेरी याद मुझको सारी रात जगाती है

रोम – रोम प्रफ्फुलित मेरा इस मधुमास में
सावन-भादों निकल गये तेरे आने की आस में

हृदय के दरवाजे पर पल – पल दस्तक देती हो
तू सपनों की रानी, पता नहीं किस देश में रहती हो

ये बसंती हवा तन-मन में सिहरन पैदा कर जाती है
दबी राख की आग, शोलों – सी सुलग जाती है

चांदनी रात तेरा एहसास कराती है
बिन तेरे मुझको बसंत भी पतझड़ लगती है

तन्हा जिंदगी करवट बदल- बदल गुजर रही
अब आ जा प्रिये बैचैनी दिन-ब-दिन बढ़ रही

© मुकेश कुमार ‘ऋषि वर्मा’

ग्राम रिहावली, डाक तारौली गुर्जर,
फतेहाबाद, आगरा, उ. प्र. 283111

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