पूर्णिमा की रातों में
बन जौत्सना चमक रही
दक्ष बना चन्द्रमा
फूलों पर आभा चमक रही
हरसिंगार महक फैली
उपवन में छटा बिखर रही
जुगनू की चमक
जैसे लुकछुप करती बिजली
ओस की बूंदें
पेड़ों पर मोती बन लुढ़क रही
रात की रानी
बन मंजरी खुश्बु फैल रही
ये कौन बाबरी
सोती सी रातों में खोयी सी
सांवली सूरत
बहुत खूबसूरत मन मोह रही
तुम चंचल नायक
ये वसुधा बनी धूम रही
प्रिय कामदेव
ये कौन रति बन झूम रही
#नीरजा शर्मा #
श्रंगार रस की कविता। नायिका चांदनी रात में अपने प्रियतम स्मरण करती बाबरी सी धूम रही है

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