खत – सजनी का सजन के नाम

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खत जो भी भेजे है मैंने

उनका तुम उत्तर दे दो

कब आओगे मुझ से मिलने

ओर नही इतना कह दो।…..

 

हार गई मैं तेरी विरह में

जग से खूब लड़ी डटकर

बस एक ही आस लगी मोहे

मिलन होय उर से सट कर

मैं नही अभागी ,मैं बडभागी

इस जग से आकर कह दो।…..(1)

 

एक सदी सा दिन लगता है

बरस लगे पल पल मुझ को

तेरी विरह में मैं मर भी न पाऊ

कि तू मिल जाएगा कल मुझ को

कब से व्याकुल है तन मन ये

आकर के तुम खुशियाँ भर दो।……(2}

 

तेरी पाती अब आएगी, अब आएगी

यों कह कर दिल समझाते है

बरसों बीत गए समझाते

पर अब तक समझ न पाते हैं

तेरे उधर से आती जो पुरवी

उससे ही कुछ संदेशा कह दो।.(3)

 

रिश्ते नाते सब झूठे हैं

ये देश पराया लगता है

तुझ बिन ये जीवन मेरा

एक काला साया लगता है

आ जाओ अब देर न कर

मुझ को एक मीठा सुख दे दो।.(4)

 

सब पूछ रहे तू गया कहाँ

मैं सबसे क्या कह दूँ प्रियवर

आजा जलदी जलदी आ जा

तेरी राह निहार रही हूँ प्रियवर

पथ देख देख पथरा गये नैना

अब तो तुम दर्षन दे दो। ……(5)

 

सोच लिया मैंने जब तू आये

सीने से तुझे लगा लूगी

जनमो जनमो की प्यासी हूँ

मैं सारी प्यास बुझा लूगी

उनसे हो मिलन आखिरी मेरा

मोला ! इतनी मोहलत तो दे दो।…(6)

 

फिर मर भी जाऊँ तो क्या गम है

उससे मिलन हुआ ये क्या कम है

मैं यह प्रीति निभा करही जाऊंगी

उन्हें हृदय लगा कर ही जाऊंगी

नहीं मुँह मोडो अब मुझसे दिलवर

मेरे खत का तुम उत्तर दे दो। .(7)

 

खत जो भी भेजे है मैंने

उनका तुम उत्तर दे दो ………….

 

राघव दुबे

इटावा (उ०प्र०)

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