अपना अस्तित्व

सोच रही हूँ मैं
अबतक अपने से अनजान रही
परिवार में इतना डूबी
अपने को न पहचान सकी
कभी बच्चों को पढ़ाया
घर के कामों में डूब गयी
अपमान हुआ जब भी मेरा
मैंने सबको माफ किया
ताड़ना और प्रताड़ना
हंसकर मैंने टाल दिया
बच्चे अब बड़े हुए
अपने कामों में व्यस्त हुए
खाली मन ने पहचाना
क्यों सबकुछ मैं भूल गयी
अब मन करता मेरा
कविता कहानी लिख डालूं
बचपन का जो शौक मेरा
अब उसका विस्तार करूं
अब मन करता मेरा
फूलों से खिलवाड़ करूं
कभी सितारे कभी चन्द्रमा
पृथ्वी को उपहार में दूं
सूर्य रोशनी को लेकर
प्रज्वलित मैं प्रकाश करुं
इन्द्रधनुषी रंगों को
ले तूलिका मन रंग डालूं
घटाओं बारिशों से
नये प्रेम गीत में रच डालूं
ख्वाब और अरमानों के
नये किले फतह मैं गढ़ डालूं
सोच रही मैं
अबतक अपने से अनजान रही
#नीरजा शर्मा #

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