बचपन के ख्वाब

चलो कुछ याद करते हैं,
और कुछ भूल जाते हैं,
अपने बचपन के ख्वाबों को,
चलो फिर से सजाते हैं।

चलो गिल्ली बनाते हैं,
और डंडा भी लाते हैं,
बड़े भैया से छुप-छुप कर,
चलो उधम मचाते हैं।

चलो कंचे बजाते हैं,
और गड्ढा बनाते हैं,
किसी पेड़ के छाँव में जाकर,
चलो दो हाथ आजमाते हैं।

चलो माचिस चुराते हैं
और तीली जलाते हैं,
हारी बाजी जीतने के खातिर
चलो ताश के जोड़े बनाते हैं।

#शफ़ीक़

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This Post Has 2 Comments

  1. Binayak

    good

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  2. Saurabh

    सराहनीय!!

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