दिवाली सजती रही ,अँधेरा पसरता रहा,

दिए व्यर्थ ही जलाते रहे रात भर !

पावस प्यासे में प्यास और भडकता रहा,

शबनम पानी पिलाती रही रात भर!

पतझड़ कलियों से मधुबन सजाता रहा,

मलायानील तन को जलाता रहा रात भर!

चन्दा बादलों में छुपके सोती रही,

जुग्नू की ज्योति चमकती रही रात भर!

कलियाँ पत्तो के ओट से से शर्माती रहीं,

कांटे खुशबू लुटते  रहे रात भर!

सेतु टूटते रहे, दीवारें बनती रहीं,

कामनाएं सिसकती रहीं रात भर!

ज़ख्म फूलों ने दिये, मरहम पत्थरों ने किये,

‘सुधाकर’ करवटें बदलता रहा रात भर!

घर मेरा जलता , यार जश्न मानते रहे ,

बेगाने , लपटें बुझाते रहे रात भर!

– सुबल चन्द्र राय ‘सुधाकर’

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