रविवार के दिन सुबह से ही घर के बाहर शोर -गुल होना शुरू हो जाता । मैं उठकर छत के एक कोने से बाहर झांकने की कोशिश करता । लेकिन मै था जो छोटा । मेरे बार – बार प्रयास करने के बाद भी मै ढंग से नही देख पाता । मन मे एक अभिलाषा सी रहती । आखिर हर रविवार को यह शोर कैसा । तभी मेरे पड़ोस की नन्ही सी परी आई । मैंने सोचा कि चलो उससे पुछते है। लेकिन वो भी तो ठहरी छोटी ।

हर रविवार मै जल्दी उठकर छत के उसी कोने से बाहर झांकने की कोशिश करता । लेकिन छोटे होने के कारण मै बार बार असफल हो जाता । फिर वक्त निकालता गया और वो दिन आ ही गया । जब मैंने बीना कूदे फाने छत के चारो तरफ से बाहर देख पाया । तब मेरी समझ मे आई की यह तो बचपन है। जिसमे न गम है न ही आंसू । है तो सिर्फ खुशी । फिर मैंने हर रविवार को उन बच्चो के साथ खेलने जाने लगा । एक दिन खेलते – खेलते ज्यादा देर हो गयी । जिसकी वजह से मुझे बाहर जाना मना हो गया। इसके बाद मैंने छत से हवाओ मे उड़ते पतंगो को देखा करता । और मन ही मन मुस्कुराता ।।।

देखो बिन हाथ पैर के,

सरपट -सरपट उड़ता जाता,

हवाओ से टकरा कर,

आसमान मे दौड़ लगाता ।।।।।

धीरे-धीरे मै बड़ा हो गया । फिर मै भी अपनी मां से जीद कर पतंग और धागे खरीदवाया।      लेकिन मुझे उड़ाने तो आता ही नही था। मैंने चुपके से नीचे जाकर अपने दोस्तो से पतंग मे डोर लगवाया । फिर जल्दी से छत पर आ गया । आने के बाद मैंने जैसे देखा मेरी मां मुझे देख मन ही मन मुस्कुरा रही थी । मेरी तो डर से सारे शरीर मे कनकनाहट होने लगी । मां को मुस्कुराता देख मेरी जान मे जान आई । और मेरी भी पतंग मेरे दोस्तो के पतंगो के बीच सरपट सरपट उड़ने लगी ।

वक्त गुजरता गया और मै बड़ा हो गया । फिर न जाने मेरी पतंग उन हवाओ मे कहां खो गई ।     आज भी मै जब आसमान मे देखता । तो मेरी बचपन की यादे तरो ताजा हो जाती ।।।।।।।।    और उन हवाओ मे मै अपनी पतंगे ढूढने लगता ।।।।।।।।।

काश वो दिन दोबारा आ जाते ,                                         मां की डांट और प्यार पाते,                                              खेलते – खेलते जब थक जाते,                                           मईया मेरी गोद मे सुलाते ।।।।।

राहुल कुमार

जवाहर नवोदय विद्यालय, सरायकेला, झारखंड (बैच-12–17)

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