काग़ज की कश्ती

काग़ज की कश्ती

By |2018-01-27T21:47:40+00:00January 27th, 2018|Categories: गीत-ग़ज़ल, बचपन|Tags: , , |4 Comments

काग़ज की कश्ती तैराने का मन करता है

आज फिर बरसात में नहाने का मन करता है

क्यूँ लगने लगा गंदा राह का पानी मुझको,

वो बचपना फिर से जगाने का मन करता है

क्या कहेंगे लोग मत कर परवाह उसकी

बर्षात में फिर से गाँव जाने का मन करता है

वो समय फिर से ना आ सकता है दुबारा

बार-बार फिर क्यूँ दोहराने का मन करता है

ढूँढ़ने लगी हैं आँखें अब बचपन के मित्र सारे

फिर से वो मज़मा जमाने का मन करता है

ये उम्र है कि व्यग्र हर पल बदलती रही सदा

निकल गयी उसे क्यूँ बुलाने का मन करता है

 

—– *विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’*

गंगापुर सिटी (राज.)

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4 Comments

  1. Vyagra January 28, 2018 at 5:31 am

    आद. धन्यवाद !

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  2. अनुभव पत्रिका January 28, 2018 at 9:29 am

    बहुत ही खूबसूरत रचना… आपका हार्दिक स्वागत!

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  3. सुबल चन्द्र January 30, 2018 at 9:03 pm

    और ऐसी रचनाएं प्रकाषित हो व्यग्र साहब ,तो बार -बार पढने को मन करता है|
    बहुत खूब

    Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
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  4. विश्वम्भभर पाण्डेय 'व्यग्र' February 23, 2018 at 8:47 am

    आद. सुबल साहब का बहुत-2 धन्यवाद !

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