लोहे की नगरी

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लोहे की नगरी

By |2018-03-25T20:50:12+00:00January 28th, 2018|Categories: गीत-ग़ज़ल|Tags: , , |0 Comments

हम तो आयें हैं लुटाने दिल का प्यार यारो,

हमें क्यों समझा जा रहा है कसूरवार यारो|

 

दर्द लेना ,दुवा देना , रहा है अपना उसूल,

यही है अपना इमान व कारोबार यारो|

 

नगरी है ये लोहे की ,लोग यहाँ पत्थर के बने,

यहाँ बाज़ारों में बिकता है दिल का प्यार यारो!

 

ज़ख्म पर नमक छिडकना है यहाँ का चलन ,

मरहम तो बेज़ख्म पर लगता है बार-बार यारो|

 

प्यासे को धुप की सजा मिलती है यहाँ,

बिना मांगे मिलती है,ज़ाम हज़ार यारो|

 

दीन व धरम की बातें बस होठों के गहने हैं,

धरम भी यहाँ धंधे में ,होता है शुमार यारो|

 

चंडी की चकाचौंध के मरे हैं, लोग यहाँ,

सिक्के की खनक में ,खोया है यहाँ इन्साफ यारो|

 

जिन्दे को फटी चादर तक देना है ,न तहज़ीब यहाँ ,

मुर्दे पे लूटे हैं कीमती चादरे बेशुमार यारो|

 

नफ़रत की  खाईयाँ पटना,  है ख़ता यहाँ,

है ‘सुधाकर’इस ख़ता का, ख़तावार यारो|

 

हम तो आयें हैं लुटाने दिल का प्यार यारो!

हमें क्यों समझा जा रहा है कसूरवार यारो|

– सुबल चन्द्र ‘सुधाकर’,

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