अनंत यात्रा

उस दिन
जब चला था मैं
अपनी अज्ञात यात्रा पर

मेरा घर
ढोल-बाजे, गीत-बधावे से
गुलजार हो गया था
माँ और फुआ के पाँव
ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे
बाबूजी तो खुशी के नशे में मत्त थे
पास-पड़ोस के लोग भी
कहते हैं कि अघा गये थे उस दिन
उस दिन मुझ अज्ञात यात्री का
नामाकरण हुआ था

आज भी मैं
उसी अज्ञात यात्रा पर हूँ
हालाँकि, आज
मेरे घर में
कोई रौनक नहीं है
आज एक तरह से मेरा नाम
जैसे कहीं खो गया है
फिर भी जीना है
बस, इसीलिए जिये जा रहा हूँ

उस अज्ञात मंज़िल तक
जिस दिन पहुँच जाऊँगा
उस दिन भी
मेरा घर फिर से
ढोल-मंजीरे से गुलजार हो जाएगा

और इस तरह से
मैं अपनी अज्ञात
किंतु अनंत यात्रा पर निकल पड़ूँगा

बस,
ये सुकून है थोड़ा-सा कि बाद मेरे
मेरे चले जाने के बाद भी
मेरा नाम कहीं खो नहीं जाएगा

बल्कि,
किसी कागज़ पर, किसी पुस्तक में
किसी न किसी ऑडियो या वीडियो में
किसी न किसी के दिल और दिमाग में या
किसी की मधुर यादों में अवश्य रह जायेगा

डॉ. गोपाल निर्दोष

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