बचपन का हसीन चेहरा

खो गया ,
 भीड़ में मेरा वो चेहरा
 मासूम था
 नापाक था
 निश्‍छल था
 वास्‍तविक था जो।
गुम हुआ बचपन की गलियॉं छूटते ही
चढ़ता चला गया,
नकाब पर नकाब
असत्‍य का ,
फरेब का, 
छल का,
शायद,
हॉं शायद ही कभी मिल पाए
वो चेहरा
जिस पर न हाेगा नकाब
बाहर-भीतर से एक समान
स्‍वच्‍छ पानी सा निर्मल 
सफर में छूटे सामान की तरह
शायद ही मिल पाएगा
मेरा वो हसीन चेहरा,
बचपन का ।
काश 
फिर से मिल जाए मुझे
मेरा वो खोया चेहरा।
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Anju

Working as Translator for the last 17 years.

This Post Has 2 Comments

  1. यथार्थ समेटे हुवे आपकी ये रचना बहुत की सुन्दर है|

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  2. धन्‍यवाद सौरभ जी

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