मोहब्बत लिये ज़िन्दगी चल रही है
सफ़र में क़ज़ा साथ भी चल रही है

किनारे उधर रंजो-ग़म चल रहे हैं
किनारे इधर हर ख़ुशी चल रही है

तेरी ज़ुल्फ़ बिखरी तो छाई घटायें
हवा भी लिये कुछ नमी चल रही है

नज़र जब नज़र से मिली , मुस्कुराई
बिना मय के ये मयक़शी चल रही है

कहीं भूख इतनी , निवालों की ख़ातिर
ग़लत राह पर बेबसी चल रही है

कहीं रौशनी की शुआओं से बचकर
छुपाकर बदन तीरगी चल रही है

हैं अल्फ़ाज ‘आनन्द’ जज़्बात के बिन
हवा में कहीं शाइरी चल रही है

स्वरचित
डॉ आनन्द किशोर
दिल्ली

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