मिलेंगे ये कहां जाकर नदी के जो किनारे हैं
हमारे जैसे दोनों हैं फ़क़त किस्मत के मारे हैं

फ़क़त ख़्वाबों की दुनिया है ज़हां केवल ख़यालों का
नहीं अपना गगन है ये नहीं अपने सितारे हैं

झुकाकर वो नज़र रखते मिले नजरें भला कैसे
बहुत बेचैन दिल मेरा नहीं मिलते इशारे हैं

रक़ीबों से वो करते हैं बहुत बातें, नहीं मुझसे
सुलगते दिल में अब मेरे शरारे ही शरारे हैं

न कुटिया में उजाले हैं नहीं है पास में रोटी
शिकायत वक़्त से भी है मुक़द्दर के वो मारे हैं

हमारे अम्न की ख़ातिर हिफ़ाज़त देश की करते
लड़ा करते जो सरहद पर सभी मां के दुलारे हैं

मगर कहनी तो पड़ती है हक़ीक़त ये ज़रा कडुवी
सदा ही ग़ैर को जीता मगर अपनों से हारे हैं

अगर मौका मिला ‘आनन्द’ दिखलाना है कुछ करके
बलन्दी पर पहुंचना है , इरादे ये हमारे हैं

स्वरचित
डॉ आनन्द किशोर
दिल्ली

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