आज दीदी आने वाली हैं पूरे एक साल बाद मिलेंगे हम दोनों | पिछले साल उनकी बेटी की शादी में ही मिले थे | मैं जल्दी जल्दी घर का काम निबटाने में लगी हुई थी | सोचा खाना भी बना कर रख देती हूँ फिर मज़े से बैठ कर जी भर कर बातें करेंगे |
दीदी की पसंद की भरवां भिंडी और दम आलू बना कर रख दिए | अब भी दो घंटे बचे हैं उनके आने में अब तो इंतज़ार नहीं हो रहा |अनिल आधे घंटे में निकल जाएंगे स्टेशन के लिए | मैंने पूछा , ” सुनो खाना परोस दूँ आपके लिए ? मैं तो दीदी के साथ ही खाउंगी | ”
” तो सब साथ ही खा लेंगे अभी भूख भी नहीं है मुझे थोड़ा जल्दी निकलना पड़ेगा पेट्रोर भी डलवाना है कार में |” दस मिनट बाद वो निकल गए | मैंने जैसे तैसे अपना समय काटा | बाहर अनिल की गाडी की आवाज़ सुनते ही मैं फटाफट उठ कर भागी दीदी से मिलने को |
दीदी भी बहुत खुश थीं | चाय पीने के बाद नहा धोकर जब वो आयीं तब तक मैं खाना परोस चुकी थी । अपनी पसंद की
सब्ज़ियां देख कर बहुत खुश हुईं | खाते खाते उन्होने ऋतु की ससुराल की बातें करना शुरू कर दिया ” ऋतु तो इतनी खुश है ससुराल में कि क्या बताऊँ मुझे तो हमेशा उसकी चिंता लगी रहती थी की मेरी झल्ली बेटी को उसके ससुराल वाले झेल भी पाएंगे या नहीं ” हम सब हंस पड़े |
“अरे वाह दीदी! यह तो बड़ी ख़ुशी की बात है किस्मत से मिलते हैं इतने अच्छे लोग | मोती दान किये होंगे आपने पिछले जनम में जो इतना अच्छा घर मिला हमारी ऋतु को |”
” सच कह रही है नीतू उसकी सास ने तो उसे अपनी बेटी ही बना लिया है | खाना बनेगा तो उसकी पसंद का, खरीदारी होगी तो उसके साथ घूमने फिरने जाएंगे तो सब साथ | क्या क्या बताऊँ ! ”
अच्छा ! क्या बात है ! मेरा तो मन कर रहा है की उन लोगों से मिलूं तो एक बार शादी में तो इतना पता नहीं चलता |
” हां इस बार तू आयेगी तो मिलवा दूँगी। ”
“आजकल वैसे कुछ लोग समझदार होते हैं । और ठीक ही है ना दीदी , घर में सब खुश रहें तो न कभी लडाई झगड़ा हो और ना ही कोई बहू बेटा अलग रहना चाहें । ”
‘ अरे ऐसी तो कोई सास नहीं होती जिसे अपनी बेटी के साथ शॉपिंग न जाकर बहू के साथ जाना पसन्द हो।लेकिन उनको तो ऋतु के सिवा किसी की पसन्द पर भरोसा नहीं है ।
” एक बार अकेले जाकर सूट खरीद लायीं जाकर ऋतु को पसन्द नहीं आया उसने पता है क्या कहा अपनी सास को ? जैसे मुझे कह देती है वैसे ही उनको भी कह दिया क्या मम्मा ! बेकार सूट खरीद लिया , आप मत जाया करो अकेले पैसे खराब करती रहती हो ।”
“सच!”
“हां— बता ज़रा । मुझे बता रही थी तो मैने डाँटा। मुझे कहने लगी आपकी तरह नहीं हैं वो । बुरा नहीं मानतीं मेरी बात का। ”
दीदी हंसने लगीं । “वैसे वो भी बहुत प्यार करती है अपनी सास से । उनके लिये कभी कुछ कभी कुछ खरीदती रहती है उनकी पसन्द का ।”
और अंकित कैसा है ?
“वो भी बडा हंसमुख है। घर आता है तो बिल्कुल लगता ही नहीं कि दामाद है। बिल्कुल घर के बच्चों की तरह रहता है । ”
“वाह भई वाह ! नजर न लगे।हमेशा खुश रहें बच्चे ।”
“उसके ससुर जी की भी नेचर बहुत ही अच्छी है । वो भी ऋतु को अपनी बेटी ही मानते हैं बहू नहीं । पता है अपना फोन खरीदना था उनको तो बेटे के साथ जाकर नहीं लिया बोले ऋतु की पसन्द से लूंगा ।”
“आप बता रही हौ तो लग रहा है कि राज श्री वालों की किसी फिल्म की कहानी सुन रही हूँ। ”
“मुझे तो खुद ऐसा ही लगता है उनका घर। एक दिन उसके ससुर जी का गोलगप्पे खाने का मन था , सास ने मना कर दिया तो ऋतु के साथ चले गये गोलगप्पे खाने । ” दीदी हंसे जा रही थीं बताते बताते।उनकी खुशी फूटी पड़ रही थी ।
” छोटी-छोटी बातें हैं।पर कितनी प्यारी बातें हैं दीदी ।”
दीदी की बातों में पता ही नहीं चला समय कैसे कट गया ।
चार दिन हो गये थे उन्हें आये और आज वापस जा रही थीं।
दीदी चली गईं और मैं सोचती ही रही कि इतने भले लोग भी हैं इस दुनिया में।

सचमुच कितने प्यारे रिश्ते होते ये। अगर समझदारी से निभाये जाएं तो कभी तकरार हो ही न। थोड़ी समझदारी सास दिखाये और थोडी बहू तो सदियों से चला आया टकराव खत्म हो जायेगा एक दिन । बात तो सपनों की सी है पर शायद वो दिन आ जाये कभी ।

आपको मेरा ब्लॉग पसन्द आया हो या नहीं आप अपनी राय अवश्य बतायें ।

Rating: 4.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...

2 Comments

  1. ह्रदय स्पर्शी ….बहुत ही अच्छा!

    No votes yet.
    Please wait...
  2. Manju Singh

    जी आभारी हूं !

    No votes yet.
    Please wait...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *