शिक्षक या शापित (भाग 1)

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शिक्षक या शापित (भाग 1)

By |2018-02-09T08:50:52+00:00February 9th, 2018|Categories: कहानी, धारावाहिक|Tags: , , |1 Comment

अभी दो दिन पहले मैं रस्ते से जा रहा था. रास्ते के एक बाजु में कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था. कुतूहलवश  मैं वहा थोड़ी देर रुक गया तो मुझे वहाँ एक लड़का दिखाई दिया. मैं गौर से उसे निहार रहा था लेकिन उसे इस बात का कोई अंदाजा नहीं था. वह जितनी मेहनत और लगन से वह काम कर रहा था की मानो वह अपने घर का कोई महत्वपूर्ण काम कर रहा हैं.

उसकी उम्र लगभग 22  -23 साल होगी. काम तो पुरे लगन से कर रहा था पर वह उस काम में कुशल नहीं लगा रहा था. काम करना और कुशलता होना ये दोनों बातें मैंने सरकारी दफ्तोरोंमे काफी अच्छी तरह से समज ली थी. उसके चेहरेसे पसीने की बुँदे टपक रही थी पर उसकी उसे कोई परवाह नहीं थी.

मेरे स्वभाव गुण अनुसार उसके बारे में जानने की ईच्छा मैंने अपने आप से कह दी. अपने आदत से मैंने इशारा करके उसे अपने पास बुलाना चाहा पर वह आया नहीं. फिर एक बार मैंने कोशिश की तो उसने पहले ठेकेदार की तरफ देखा और जब उसने सर हिलाया तब वह लड़का मेरे तरफ चल पड़ा.

मनुष्य दुसरे किसी मनुष्य को नाम के बिना पहेचान ही नहीं सकता और मैं भी एक मनुष्य था. मैंने उसका नाम पूछा तो उसने अपना नाम अरुण बताया. मैंने उसके बारें में और जानना चाहा .उसके बाद उसने जो बताया वह सुनकर मेरा दिल दहल गया.

उसने अपने बारे में बताते हुए कहा कि वह एक गाँव से आया हैं. उसके पिता गाँव में खेती करते हैं. उसको 2 भाई और 1 बहन भी हैं. उसका पूरा परिवार गाँव में ही रहता हैं. सब भाई और बहनों में वह सबसे बड़ा हैं. अध्यापक होने के कारन मैंने उसका एजुकेशन जानना चाहा. अरुण ने बताया कि मैंने DTEd  के साथ ग्रेजुएशन भी पूरा किया हैं.

तब मैंने पूछा, “भाई तुम इतने पढ़े लिखे हो तो दूसरा काम क्यों नहीं करते?”

उसने अपना सर नीचे किया. जमीन पर स्थिर हुए अपने अंगूठे से मिट्टी रगड़ते हुए उसने कहा, “सर सबके मन में अच्छा काम करने की चाहत होती हैं वैसेही मेरी भी थी. मैं आपके ही तरह अध्यापक बनना चाहता था. मेरे जीवन की सबसे बड़ी इच्छा थी की मैं भी अध्यापक बनके मेरे छात्रों को सबसे बेहतर ज्ञान दू. मेरे साये में पढे बच्चे आगे जाकर अपना और अपने परिवार का नाम उजागर करे. पर क्या करे? पर शायद मेरे किस्मत में ऐसा नहीं लिखा  था.”

उसकी वह विवशता देखकर मुझे बहुत दुःख हुआ.

उसने आगे बताया, “सर मेरा सब परिवार खेती करता हैं. खेती कम होने की वजह से मेरे माँ-बाप घर के खेती का काम हो जाने के बाद दूसरे खेतोंमे मजदूरी का काम किया करते हैं. उनकी बहुत इच्छा थी कि मैं पढ लिखकर अध्यापक बनु. वह हमेशा कहते थे कि बेटा पैसे कमाने के लिए डॉक्टर, इंजीनियर तू नहीं बनेगा तो भी ठीक हैं पर एक पीढ़ी तैयार करने के लिए अध्यापक बन जा. मेरे पिताजी बापू के बहुत बड़े अनुयायी हैं. आदर्शवाद उनके नस नस में दौड़ रहा हैं.

जब मेरा एडमिशन अध्यापक विद्यालय में हुआ तो उनके ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा. मानो आकाश भी उनके सामने छोटा दिखाई दे रहा था और मेरी अनपढ़ माँ उसी दिनसे मुझे शिक्षक समजने लगी थी. सबसे बड़ी ख़ुशी यह थी कि मैं पिताजी का सपना पूरा करने जा रहा था. बाद में सब ठीक चल रहा था. मौसम के साथ मेरे जिंदगी के  दिन भी बीत रहे थे.

मेरा अध्यापक विद्यालय का आखिरी साल बाकि था कि उस साल सूखा पड गया. सूखे पड़ने कि वजह से फसल कुछ अच्छी नहीं हुई. किसानो के लिए  अच्छा साल शायद ही आता हैं. कम से कम सालभर का गुजारा हो जाए ऐसा हर एक किसान सोचता हैं. लेकिन यह साल फिर एक बार नियति ने परीक्षा लेनी चाही. अमीरों  के लिए जादा दाम में  चीज़े खरीदना मुश्किल हो सकता था लेकिन हमारे लिए यह बात बिलकुल नामुमकिन ही थी. मेरे पिता जैसे छोटे किसान के पास न तो बैंक बैलेंस होता हैं और न ही बेचने के लिए सोना, और उन्ही दिनोंमे मुझे अपने कॉलेज में फीस जमा करने के लिए कहा गया. एक ओर गांव में पड़ा सूखा था और दूसरी तरफ मेरे पिताजी का सपना.

कॉलेज के अध्यापक को विनती करके मैंने कुछ दिनोकी मोहलत मांग ली. आप किसी चीज़ के लिए मोहलत मांगो दिन बहुत जल्दी कट जाते हैं, मेरे साथ भी ऐसा हुआ. कॉलेज द्वारा दी गई समयसीमा ख़तम हुई, पैसे जमा करने को मुझे मेरे कॉलेज से बार बार कहा जा रहा था. ना तो मैं कुछ कमाता था और नहीं मेरे पास पैसे थे इसिलए पैसे लाने के लिए मैं फिर एक बार गांव आ गया. गाँव कि हालात देखकर पैसा मांगना मेरे लिए बहुत कठिन था. मैंने वैसे ही कुछ दिन बिना कुछ कहे बिता दिए, इस बार मेरी छुट्टियाँ इतनी लम्बी कैसे हैं यह समझना पिताजी के लिए कठिन नहीं था. मुझे बार बार पूछे जाने पर मैंने झूट का सहारा लिया. लेकिन कितने दिन मैं इस तरह कॉलेज छोड़कर घर रह पाता? जिनके सपने मेरे सहारे ही पुरे हो सकते हैं और जो मुझसे बड़ी अपेक्षा करते हैं ऐसे मेरे पिता से मैं और कितने दिन झूट कहता रहता  ? आखिर न चाहते हुए भी मैंने यह बात अपने पिताजी को बता दी.

उस रात मैंने देखा कि पिताजी रात भर सोये नहीं पाये .सुबह उठने में मुझे देर हो गई. जब मैं उठा और घर के बाहर दाँत मांझने गया तो कुछ अलग लग रहा था, कुछ तो बदला बदला लग रहा था. समझने में मुझे देर लगी लेकिन समझ में आया तो पता चला कि हमारी प्यारी गाय जिसको हम प्यार से कमली कहते थे वह अपने जगह नहीं थी. मैंने भैय्या से पूछा तो पाया कि पिताजी ने उसे सुबह ही कसाई को बेच दिया.

मुझे विश्वास नहीं हो रहा था. पिताजी कमली को कैसे बेच सकते थे? दादी के जाने बाद अगर पिताजी किसीके साथ जादा समय बिताते तो वह कमली थी. कमली हमारे घर के सदस्य से कम नहीं थी. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था. मैंने पिताजी के तरफ देखा और उनके आंखे से निकले असहायता के आंसू बहुत कुछ कह गए. मेरे भी आँखों से आंसू निकल आये. सिर्फ चंद पैसो के खातिर हमें अपनी कमली को बेचना पड़ा. कैसा मानव का स्वभाव हैं अपने स्वार्थ के लिए वो किसीको भी नहीं छोड़ता. जिस कमली ने दादी कि कमी भर दी थी उसी कमला को हमने बेच दिया. पिताजी ने मेरे हाथ में पैसे थमा दिए.

पैसे लेकर तो मैं कॉलेज जा रहा था लेकिन उन हरे नोट के जगह मुझे कमली का खून नजर आ रहा था.

मैं वो इन्सान था जो अपने स्वार्थ के लिए अपने पिता के हाथों किसी परोपकारी प्राणी के प्राण ले चूका था. मुझे कॉलेज के इस आखिरी साल सब भूल कर नयी शुरुवात करनी थी, मैं समय के साथ सब भूल भी जाता पर क्या मेरी अनपढ़ माँ जिसे लक्ष्मी समझती थी उस कमली के ना होने को स्वीकार कर पाती? क्या मेरे पिताजी जो अपनी माँ के तरह उस कमली को प्यार करते थे वो कमली के खून का प्रायश्चित्त कर पाते?

और कमली? जो पुरे विश्वास के साथ अपने मालिक के साथ उस दिन बाजार में गई होगी वो अपने मालिक के इस कृत्य को माफ़ करती थी. बेचारीने क्या सोचा होगा पता नहीं पर मनुष्य जाति से उसका विश्वास उठ गया होगा इसमें कोई संदेह नही होगा..

मैंने अतीत को भुलाकर अपना वर्तमान बदलने की ओर अपने कदम बढ़ाये…

(क्रमशः)

लेखक : Banak from www.sbfied.com

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One Comment

  1. ओनिका सेतिया 'अनु' February 9, 2018 at 11:36 am

    बेहद मार्मिक

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