झलकाया नभ ने कैसा चाँद
पूरा दुख और आधा चाँद

देखे आंसू मेरे गालों पे
मेरी ख़ातिर ही रोया चाँद

मामूली शै नहीं दुनिया की
मेरा चंदा है रब का चाँद

सब पर ही चांदनी बरसाए
झूठे इन्सां हैं सच्चा चाँद

चालाकी से हमेशा दूर
है वैसे सीधा-सादा चाँद

दिन जो आये अमावस का तो
डूबा-डूबा सा खोया चाँद

लेकर तारों की वो बारात
कितना लगता है अच्छा चाँद

तू भी पकड़े बलन्दी ऐसी
जैसे ऊपर को चढ़ता चाँद

आती जब-जब है पूनम रात
सबने ‘आनन्द’ देखा चाँद

स्वरचित
डॉ आनन्द किशोर
दिल्ली

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