बलात्कारी: समाज पर कलंक

तुम्हें आदमी कहूँ अगर
तो आदमी शब्द की ये तौहीन है
तुम्हे जानवर भी क्यों कहूँ
वो भी तुमसे तो बेहतरीन है
तुम्हे राक्षस भी कहूँ अगर
तो रावण का भी तुममे अंश नहीं
सीता की आज्ञा नहीं थी इसलिए
उसने किया उन्हें कभी स्पर्श नहीं
तुम्हें कहूँ अगर विषैला नाग
तुम तो उसके भी लायक नहीं
एक बार में हर लेता है प्राण
पर देता ज़िन्दगी भर का गम नहीं
कलंक हो तुम उस परिवार का
जिस परिवार ने तुमको पाला है
अपनी माँ के प्यार, संस्कारों का
तुमने क्या खूब क़र्ज़ उतारा है
एक बलात्कारी की माँ कहलाये
इस से अच्छा तो मर जाना है
नही तो बेटे की दी सौगात का
सारी जिंदगी ही बोझ उठाना है
माँ है ये एक दुष्कर्मी की
ये ही बन जाती उसकी पहचान है
उसका बस ये ही दोष है कि
तुमसे जुड़ा उसका नाम है
जो भी हो
सच ये है कि
तुम से लोग
किसी पहचान के हकदार नहीं
ना कोई तुम्हारा धर्म है
है थोड़ा भी ईमान नहीं
ना तुम्हारा कोई नाम है
है तुमसा कोई बदनाम नहीं
क्या पहचान दूँ मै तुम्हें
इस समाज ही क्या
इस दुनिया में ही
है तुमसा कोई हैवान नहीं

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माधुरी

प्राध्यापक(हिंदी साहित्य)

This Post Has 2 Comments

  1. बेहद सत्य व् सटीक रचना .

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  2. धन्यवाद

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